क्रिकेट में सब चलता है यार

       
विश्व कप के लिए भारतीय टीम घोषित हो गयी है। वह तो घोषित होनी ही
थी। पांच चयनकर्ता मिलकर बैठे और उन्होंने टीम का चयन कर लिया। बात साधारण है।
भारतीय क्रिकेट टीम भी एकदम साधारण है। इस पूरे घटनाक्रम में ऐसा कुछ नहीं है
जिस पर चर्चा की जा सके पर प्रचार माध्यम जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए इसमें
खास मसाला जोड़ने में लगे है। एक पूछता है‘‘ सहबाग को ले जाना ठीक
है?’’
            
विशेषज्ञ बड़े आराम से कहता है-‘‘यह सही है सहबाग इस समय फार्म में नहीं
है, पर उस जैसा खिलाड़ी कभी भी फार्म में आ सकता
है।’’
            
फिर प्रश्न करता है-‘‘क्या इरफान का चयन ठीक है? वह भी फार्म में नहीं चल
रहे।  विशेषज्ञ जवाब
देता है-‘‘वह भी एक ऐसा खिलाड़ी है जो कभी भी मैच जितवा सकता
है।
       सब कुछ
प्रायोजित है। प्रश्नकर्ता को ऐसे प्रश्न करने के लिए पैसा मिलता है जिससे पब्लिक को
लगे कि वह उनकी भावनाओं को समझ रहा है। विशेषज्ञ को ऐसे जवाब देने के लिए
पैसे मिलते है कि पब्लिक को लगे कि सब ठीकठाक है। कोई गड़बड़ नहीं है। क्रिकेट में
घ्र से नीचे तक सब गड़बड़झाला है।
       एक समय था
जब इस टीम की छबि विश्व विजेता की थी-और हम इस पर गर्व करते थे। चार दोस्त
मिलते तो आपस में इसकी तारीफ कर अपना समय बिताया करते थे। मैं पिछले तीस वर्षों
से क्रिकेट खेलने और मैच देखने के साथ कमेंटघ्ी सुनने का आदी हूं। अब क्रिकेट
मुझे अपना खेल नहीं लगता। ऐसा भी नहीं लगता कि यह कोई जनता का खेल
है-भले ही साधारण आदमी अभी रुचि ले रहा है, पर वह जानता है कि यह खेल अब
एक ऐसा व्यापार है जिसे वह देख सकता है पर समझ नहीं सकता।
            मै आज
भी उन दिनों को याद करता हूं जब मुझे क्रिकेट देखने और सुनने का शौक था।
उस समय ऐसा लगता था कि भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं
वरन् देवदूत हो। ऐसे देवदूत जो किसी अन्य देश में नहीं बसते हैंै। टीम जब
भी  जीतती तो इतनी प्रसन्नता होती थी कि सायकल उठाकर मंदिर में भगवान को
धन्यवाद देने पहंुच जाते थे। अगर टीम हार जाती तो यार लोगों के साथ बैठकर बिना
शराब या अन्य किसी नशे के गमगलत करते थे। हारने पर सभी दोस्त एकदूसरे को तसल्ली
देते थे-‘‘अरे यार, टीम की किस्मत खराब थी हार गयी। खेल में हार जीत तो लगी
रहती है।’’
           
अब समय बदल गया है। पता नहीं कब कैसे और कहां क्रिकेट से मन विरक्त हो गया। यह
विरक्ति  आयु के साथ परिवक्वता या
समयाभाव के चलते नहीं आयी वरन् इसके पीछे था यह शक कि कहीं न कहीं गड़बड़ है।
हमने शुरूआती दौर में ऐसे मैच देखे जिसमें भारतीय खिलाड़ी विपक्षी टीम के मूंह
से मैच निकाल कर लाते थे। सुनील गावस्कर, मोहिंदर अमरनाथ, कपिलदेव, मदनलाल, रोजर
बिन्नी और यशपाल शर्मा जैसे खिलाड़ी उस समय भारत के लिये ऐसे ही थे जैसे आज
रिकी पोंटिंग, बे्रटली, मैकग्राथ और मार्टिन आस्टघ्ेलिया के लिये है। टीम ने अगर एक
बार हारना शूरू किया तो बस जीत एक नाटक होकर रह गयी। फिर भी क्रिकेट से मन नहीं
भरा।
           
फिर तो टीम के मैच खेलने का सिलसिला बढ़ता गया और साथ ही उसके हारने का
भी। कई बार शक होता था कि टीम के खिलाड़ी कुछ गड़बड़ कर रहे हैं। फिर मन का
तसल्ली देते थे-‘‘नही यार, हमारे देश के खिलाड़ी देशभक्त है। वह भला कैसे
ऐसा कर सकते है। मुझे याद है जब  सब देशों के खिलाड़ी अपने देश की टीम
में खेलने का मोह छोड़कर कैरी पैकर की सर्कस में मैच खेलने गये पर भारतीय टीम
का कोई खिलाड़ी वहां नहीं गया। मतलब यह है हम ही संदेह करते थे और ही हमारे
अंदर मौजूद देशभक्ति का जज्बा ही हमारा शंका समाधान करता था। एक नहीं ऐसे कई
अवसर आये जब मैच में भारतीय टीम स्कोर का
पीछा करते हुए उसके निकट पहुंचती और उसका जमा हुआ खिलाड़ी आउठ होता
और फिर शूरू होता था आयाराम गयाराम का सिलसिला। यह शूरू होता तो वह टीम की
हार पर ही समाप्त होता। मन मार कर यही कहते-‘‘आज यार टीम का लक नहीं था।
आजकल भारतीय क्रिकेट टीम का समय ही खराब चल रहा है।’’ वगैरह।
वगैरह
    एक नहीं अनेक बार ऐसा अवसर आया। क्र्रिकेट का जुनून ऐसा
छा गया था कि हम यह भी भूल जाते थे कि हमारे अंदर एक व्यंग्यकार भी रहता हैं।
दुनियां के सारे विषयों पर व्यंग्य लिखे पर नहंी लिखा तो क्रिकेट पर। आखिर दिल
दा मामला था।
     पर एक दिन ऐसा हुआ कि हमारी सारी हवा ही निकल
गयी। पाकिस्तान के विकेटकीपर रशीद लतीफ ने भारतीय क्रिकेट टीम के कुछ खिलाडि़यों
पर मैचे फिक्संग का आरोप लगाया। चूंकि पाकिस्तान के एक खिलाड़ी ने आरोप लगाया
था इसीलिये हमने सोचा वह दुश्मनी निकाल रहा है। एक तरफ से हमेें यह तो लगा कि वह
सही भी हो सकता है। मगर यह कैसे हो सकता था कि हम भारतीय क्रिकेट टीम के
खिलाडि़यों की देशभक्ति पर एक पाकिस्तान के कहने से शक कर जायें। मगर आखिर एक
दिन न्यूजीलैंड में खेले गये मैच पर वहीं के एक अखबार ने जब उंगली उठायी तब जो
शक था वह सच में दल गया। उसके बाद भारतीय टीम के एक खिलाड़ी ने ही अपने
साथियों पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया तो हमारा पूरा क्रिकेट के प्रति जो जुनून
था वह समाप्त हो गया। उसके बाद एक दो खिलाडि़यों पर कार्यवाही भी हुई पर
क्रिकेट के प्रति हमारा जो प्यार था वह समाप्त हो गया।
     ऐसा नहीं है कि अब हम क्रिकेट नहीं देखते। अब वह
शिद्घ्त नहीं है। मैच चल रहा हो और भारत की टीम की बैटिंग चल रही हो तो कोई
दूसरा काम आये तो हम मैच देखना छोड़ देते है-आज से पांच-छह वर्ष पूर्व
यह संभव नहंी था। हम तो क्रिकेट के ऐसे शौकिया थे जो तन और मन से समर्पित
होकर मैच देखते थे। आज के शौकिया लोगों को सट्टा लगाते हुए देखता हूं तो
सोचता हूं-‘‘अच्छा हुआ हमने मुफ्त में क्रिकेट देखा। कमसे कम हमने अपना या
अपने बाप का एक पैसा भी क्रिकेट पर बरबाद नहीं किया। यह हमारी उपलब्धि मानी जानी
चाहिए।’’
        हमने कई नवधनाढ्यों को
इसमें सट्टा लगाकर बरबाद होते देखा है। एक धनीमानी आदमी थे। हमारे रिश्तेदार
थे। कभी उनके पास पैसे की कमी हो सकती है इस बात पर हम यकीन नही कर सकते थे। उस
दिन मुलाकात होने पर हमने देखा फटेहाल दिख रहे थे। हमने उनसे पूछा-‘‘क्या
बात है साहब! आप परेशान दिख रहे है।’’
        वह बोले-‘‘क्या बतायें
साहब? समय खराब चल रहा है। मेरे बेटे पर दो करोड़ रुपये का कर्जा है। वह आत्महत्या
की धमकी दे रहा हैं समझ में नहंी आता उसकी समस्या का क्या हल हो सकता है। मेरे
से करोड़ों रुपया ले चुका है। पता नहीं करता क्या
है?’’
        हमें पता था कि वह सट्टा वह
भी क्रिकेट पर लगता है। हमने कहा-‘‘ हो सकता है क्रिकेट पर सट्टा लगाता हो।
आजकल लोग इसमें पैसा खूब बरबाद कर रहे है।’’
        ‘‘नहीं वह ऐसा नहीं कर
सकता।’’वह दृढ़तापूर्वक बोले-‘‘ वह भला क्या क्रिकेट के बारे में
जाने?’’
        हमने खामोशी अख्तियार कर ली।
हम जानते थे कि अपने बेटे की बुराई इस देश में कोई मान सकता है। देश में क्या
विदेश में भी यही ही हालत है। सैम्यूअल के बारे में नागपुूर पूलिस को शक है कि
वह मैच फिक्स कर सकता है पर वेस्टइंडीज में उसकी मां का कहना है-‘‘मेरा लड़का
कभी ऐसा नहीं कर सकता।’’
        क्रिकेट के बारे में अब
देशभक्ति जैसी कोई बात हमारे अंदर नहीं रही। इस मामले में हमें पाकिस्तान के
राष्टघ्पति परवेज मुशर्रफ का दर्शन अच्छा लगा। जब दोस्ती बढ़ाने के चक्कर में
भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान पहुंची थी। तब उन्होंने अपने देश के लोगों से कहा
था-‘‘ क्रिकेट खेल को भले ही देखो पर टेंशन मत पालो। अच्छे खेल का
सराहो। किसी भी टीम का खिलाड़ी अच्छा खेले उस पर ताली बजाओ। टेंशन मत
पालो।
        उनकी बात का प्रभाव  भी
हुआ। जब भारतीय टीम वहां गयी तो वहां के दर्शकों ने उसे भरपूर प्यार दिया। वहां
भारतीय टीम जीती। उसके बाद पाकिस्तान की टीम भारत आयी तो वह जीतकर गयी। फिर
भारतीय टीम वहां गयी तो जीतकर आयी। कहने वाले कहते है कि यह सब एक व्यापार है। हर
क्षेत्र में भारत का विरोध करने वाला पाकिस्तान इस मामलें में भारत का मित्र है। यह
देखकर आश्चर्य होता है।आरोप लगाने वाले तो यह भी लगाते हैं कि सभी खिलाड़ी
मैचों को प्रायोजित करने वाली कंपनियों के कहने पर शामिल किये जाते है-और
निकाले जाते है। किसी खिलाड़ी को निघलना आसान नहीं है। उन्होंने ढेर सारे
विज्ञापनों की शुटिंग कर रखी होती है। यही विज्ञापन विश्व कप के दौरान टीवी पर
दिखाये जाने वाले होते है। अगर उनकी ऐड फिल्म का ही हीरो न होगा तो भला उनके
विज्ञापन का क्या महत्व रह जायेगा। दुनियां का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड भारत का
है-इसमें आप अपने अर्थ ढूंढ सकते है। भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य अन्य
देशों के खिलाडि़यों से ज्यादा आय अर्जित करते है। भारत एक और दो नंबर
दोनों मामलों में क्रिकेट को आर्थिकसहायता करने वाला सबसे बड़ा देश है। कहने
वाले तो यह भी कहते हैं कि अगर भाारत की अगर नजर टेढी हो जाये तो क्रिकेट का
खेल ही बंद हो जायेगा। यह दो नंबर से सीधा आशय सट्टे से ही है-जिसके बारे
में कहा जाता है कि वह भी टीमों के हारने जीतने को प्रभावित करता है। क्या सच क्या
झूठ यह तो वही बता सकता है जो उससे जुड़ा है।
         बहरहाल हम तो अपने जैसे
क्रिकेट खिलाडि़यों को यही संदेश देना चाहते है जो मुशर्रफ साहब ने पाकिस्तानी
की जनता को दिया था। मुशर्रफ साहब के साथ सट्टेबाजों के सरदारों के सबंध है
और वह जानते है कि क्रिकेट का मामला है। कम से कम उन्होंने अपनी जनता को सतर्क कर
दिया और कहा-‘‘नो टेंशन!’’
        हमारा भी कहना है कि‘‘क्रिकेट
खूब देखों पर टेंशन मत पालो। भारत की टीम जीते तो खुशी मनाओ। अगर पिट
जाये तो कुछ देर के लिये क्रिकेट को भूल जाओ। लोमड़ी की तरह हो जाओ। अंगूर
मिलें तो उदरस्थ कर लो वरना कहो-‘‘अंगूर खट्टे
है।’’
            
याद रखना क्रिकेट कोई शेरों का खेल नहीं है। यह अग्रेजों ने बनाया है।
जिन्हें शेर की तरह साहसी नहं लोमड़ी की तरह चालाक माना जाता
है।
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