लोगों के झुंड लेकर
निकलते है वह रोज
नारे बदल-बदलकर
अपना नाम अखबार में
छपवाते हैं शीर्षक बदलकर
झुंड में शामिल लोग
उनके पीछे चले जा रहे हैं
दिमाग और शरीर
साथ लिए जा रहे हैं
अक्ल के दरवाजे बंदकर
राई जितना छोटा मुद्दा
अपने शब्दजाल से
पर्वत जैसा बड़ा बना दिया है
लोहे के खोटे सिक्के को
सोने जैसा बना दिया है
चला रहे है बाजार बदल-बदलकर
कौन रोके और कौन रुके
कौन समझे और कौन समझाए
लोकतंत्र बन गया है
झुंडतंत्र बनकर
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झुंड में लोग चले जा रहे हैं
अपनी मांगों के समर्थन में
जोर से नारे लगा रहे हैं
एक दुसरे को मुद्दे के
रहस्य समझा रहे हैं
कुछ लोग समझते हैं
कुछ समझने जा रहे हैं
फ़िलहाल तो झुंडतंत्र के
सजग प्रहरी
रोज झुंडों के नाम बदल-बदलकर
मुद्दों के शीर्षक बदल-बदलकर
अपनी रोटियाँ सेंके जा रहे हैं
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जब लोकतंत्र के चारों ओर
झुंडों का घेरा हो जाता है
तब दिखता है लोगों का राज
पर हकीकत में सिंहासन पर
डंडे वालों का डेरा हो जाता है
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