इस देश में लोकतंत्र है और अपनी मांगों के समर्थन में आन्दोलन करने का सभी लोगों को हक है पर उससे ऐसे लोगों को तकलीफ देना कहॉ तक जायज है जो न तो मांगों के बारे में जानते हैं न उनको पूरी करने या न करने के लिए उनके पास कोई शक्ति है न अधिकार। ऐसे लोगों को सबसे ज्यादा कठिनाई तब होती है जो कही रास्ता बंद या रेल रोको के कारण संकट में फंस जाते है। जिसे देखो वही अपने आंदोलन को रास्ते पर ले आता है और जाम लगाकर आम आदमी का रास्ता बंद कर देते है ।
इस देश में एक अरब दस करोड़ की आबादी है और सभी के साथ समस्याएँ है और अगर सभी उनके हल के लिए इस तरह रास्ते बंद करने लगें तो फिर सभी को अपने मोहल्ले से ही निकलने का अवसर नहीं मिल पायेगा। लोकतंत्र का मतलब यह है सब लोग समान हैं न कि सब खास हैं , और आपने आंदोलन के तहत आप सडक या रेल बंद करके ऐसे लोग जो आन्दोलन और उसके मांगों से असंबध्द हैं उन्हें कष्ट देने का हक नही रखते हैं ।
पानी नहीं है, बिजली आंख मिचौनी कर रही है और सड़कें खुदी हुईं है तो आंदोलन करिये, जुलूस निकालिये प्रदर्शन करिये, धरना दीजिये इससे भी काम न बने तो पूज्य बापू का दिया ब्रह्मास्त्र अनशन या आमरण अनशन जैसे हथियार का प्रयोग कीजिये। यह क्या बात हुई कि सडक और रेल रोक कर आम आदमी को परेशान कर रहे हैं । आंदोलनकारियों की मांगें क्या हैं जो नहीं जानता वह लोग इससे अनावश्यक कष्ट उठाते हैं ।
सड़क पर सब तरह का आदमी चलता है , कोई विवाह में जा रहा है तो कोई गम में जा रहा , कोई अपनी बच्ची को इम्तहान में छोड़ने जा रहा है तो कोई अपने परिवार के बीमार सदस्य को अस्पताल ले जा रहा है या फिर दवाए खरीदने जा रहा है । उसके रास्ते में अवरोध डालना कहॉ तक न्याय संगत है , जो आन्दोलन कर रहे हैं वह भी कोइ आसमान से नही टपकते, इस धरती के जीव हैं और ऐसा हो सकता है कि कभी ऎसी हालत सामने आने पर दुखी होते हों तब उन्हें दुसरे द्वारा रास्ता रोकने पर दुःख होता हो पर जब अपना वक्त आता है तो उस दुःख को भूल जाते हैं। हम लोगों में यही एक कमी है अपना दुःख जल्दी दिखता है दुसरे का बिल्कुल नहीं ।
यही हाल रेल रोकने का है , रेल में भी जो आदमी सफ़र कर रहे हैं उसकी स्थिति से सब वाफिक हैं , अपने शहर से दूर होकर आदमी की क्या हालत होती है सब जानते हैं , और भुगतते भी हैं । अगर कहीं रेल या बस रूक जाती है तो कितनी तकलीफ होती है यह तो सब जाने हैं पर फिर भूल जाते है और जब कोई आंदोलन में शामिल होता है तो वह भूल जाता है कि वह भी कभी रेल में यात्रा करता है और अपने प्रमुखों के कहने पर रेल रोकने लगता है । मतलब यह कि हम अपनी तकलीफों को भी भूल जाते हैं और दूसर को तकलीफ देने लगते हैं ।
हमारे सामने जो समस्याएं हैं उसके लिए हम स्वयं भी कम जिम्मेदार नहीं होते । इस लोकतंत्र में आम लोगों से चुने लोग नीचे से ऊपर तक शासन कर रहे है और अगर कोई समस्या है तो जितना वह जिम्मेदार हैं उतना ही उन्हें चुनने वाले भी हैं तो फिर दुसरे लोगों को इसके लिए तकलीफ देना उचित कैसे कहा जा सकता है ।
एक आदमी के रुप में मैं भी कोई कम तकलीफें नहीं उठाता और मुझे कई बार गुस्सा भी आता है। लोगों के सभी प्रकार के आंदोलनों से मुझे सहानुभूति होती है पर जब उसे रास्ता जाम या रेल रोको के रुप में किया जाता है तो मेरी सहानुभूति चलने वाले लोगों के साथ भी हो जाती है । इसीलिये मेरी सलाह है कि अपना आंदोलन चलाओ दुसरे का रास्ता या यात्रा तो मत रोको , पूज्य बापू द्वारा सृजित अनशन या आमरण अनशन अस्त्र का प्रयोग भी कर सकते हो। जो आंदोलन आम लोगों कि सहानुभूति खो बैठते हैं उनके सफल होने में भी संदेह पैदा हो जाता है ।
