निष्काम और सहज भाव से लिखो, बदलाव आते रहेंगे
लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर बिना लिखे भी कौनसा आ जाता है। इन्कलाब लाने वाले नारे तो ख़ूब लगाते हैं पर उसका स्वरूप क्या है और उसको लाने के लिए क्या योजना है कोई नहीं बता सकता। बस नारे लगते हैं ‘इन्कलाब लाओ’, ‘इन्कलाब लाना है’ और इन्कलाब लाकर रहेंगे। गरीबों,शोषितों और मज़दूरों के संरक्षकों के लिए यह एक पसंदीदा नारा रहा है।
इन्कलाब का सीधा अर्थ लें तो उसे कह सकते हैं कि बदलाव, यह बदलाव दो प्रकार का होता है एक तो प्रकृति स्वाभाविक रुप से मानवीय स्वभाव के साथ-साथ समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृतियों में बदलाव लाती है-और उसकी एक सतत प्रक्रिया है जो अनवरत चलती है पर हमें पता भी नहीं लगती है। दुसरा लोग स्वयं अपने प्रयासों से परिवर्तन लाते हैं और इसके लिए कहीं सामूहिक आंदोलन तो कहीं इसके लिए चरणबध्द अभियान चलाये जाते हैं। इनमें इन्कलाब या क्रान्ति शब्द सामूहिक राजनीतिक आंदोलन से ही जोडा जाता है और इनमें सोवियत संघ की लाल क्रान्ति और चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति सबसे ज्यादा मशहूर है और हमारे देश के कुछ लोग लंबे समय तक इस देश में ऐसा ही करने का सपना संजोये रहे भारतीय समाज की स्थितियाँ ऎसी रहीं कि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। अब सोवियत संघ और चीन भी खुलेपन के तरफ बढ़ गये हैं।
लिखने से बदलाव नहीं आते यह एक सत्य बात है पर बिना लिखे भी बदलाव नहीं आते यह भी उतना ही सत्य है। यह जो लोग इस समय निज पत्रक (ब्लोग) लिखे रहे हैं उनकी विषय वस्तू से कोई बदलाव नही आएगा पर उनके लिखने की जो प्रक्रिया है और उसमें लोग जैसे-जैसे जुड़ते जायेंगे लोगों की प्रवृति में भी बदलाव आ सकता है इस संभावना को नकारना गलत होगा।हमारे देश में लिखना लोग पेशे की तरह बहुत कम लोग अपनाते हैं यह अलग विचारणीय बात है पर जो लोग लिखते हैं वह अपने भावों में सामजिक संदर्भों को व्यक्त जरूर करते हैं। निज पत्रक (ब्लोग)लेखकों की बढती संख्या इस बात का प्रमाण है को लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए इसे एक साधन के रुप में देख रहे हैं ।
महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास ने जब अपनी रचनायें प्रस्तुत की होंगीं उस समय समाज में किसी बदलाव के लिए प्रस्तुत नहीं की होंगीं पर उनकी रचनाओं का जो समाज पर प्रभाव है उसे हम आज भी देख सकते हैं , उन लोगों ने अपने कार्य और दायित्व को निष्काम और सहज भाव से निभाया तो उसका प्रभाव यह हुआ कि भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण आज भी हमारे ह्रदय के नायक हैं। हिंदी भाषा में भक्ति काल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है क्योंकि उस समय कबीर, तुलसी,सूरदास, मीरा, रहीम और रसखान तथा अन्य कवियों ने जो रचनाएं इस देश को दीं वह केवल भक्ति से संबंधित नहीं है बल्कि जीवन के सत्यों को उदघाटित भी करती हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। आज जो आध्यात्म के मनीषी हैं वह अपने प्रवचनों में उनको सुनाकर लोगों पर प्रभाव डालते हैं। कुछ लोग उस काल को भक्ति आंदोलन भी कहते है । उस समय कोई इन मनीषियों ने एक झंडे तले इस आंदोलन को नहीं चलाया था पर उनकी रचनाओं ने ही उस काल को एक आंदोलन के रुप में स्थापित किया। इनके लिखने या कहने का उद्देश्य समाज में बदलाव लाना नहीं था पर वह आया और आज समाज में इनकी रचनाओं की चर्चा होती है।
भारत के इन मनीषियों जैसा कोई बन ही नहीं सकता, कम से कम पैसा लेकर लिखने वाला तो कतई नहीं। हाँ, इनकी रचनाओं को दुहराकर या उनके क्रम में अपनी रचना कर इस समाज में निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, वैसे भी भारतीय समाज बहुत उदार माना जाता है जो परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए चलता है बशर्ते वह उसके अनुरूप हौं और उस पर थौपे न जाएँ । निज पत्रक (ब्लोग) वैसे ही हैं जैसे समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ ,टीवी चैनल और अन्य मध्यम । इसके लेखक भी वैसे ही हैं-इनके लिए कोई अलग से संज्ञा ढूँढने की आवश्यकता नहीं है ।कहने वाले तो यह भी कहते हैं संचार माध्यम भी कोई इन्कलाब या बदलाव नहीं ला सकते, और यकीनन निज पत्रक (ब्लोग) लेखकों पर भी यह विचार लागू होता है।
समाज में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है और लिखना भी। किसी के लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर इसीलिये लिखना बंद भी तो नहीं किया जा सकता-आख़िर आत्म अभिव्यक्ति के लिए इससे बेहतर कौनसा साधन है। निष्काम और सहज भाव से लिखते रहो तो इन्कलाब या बदलाव भी आयेगा नहीं आया तो इस बात का अफ़सोस तो नहीं होगा कि हमने कोई प्रयास नहीं किया। अगर हमारे लिखे बग़ैर बदलाव आया तो हमें भी यह अफ़सोस होगा कि हमने लिखा क्यों नहीं । समाज में बदलाव के प्रक्रिया के साथ लिखना भी जारी रहना चाहिए। हमारे लिखने से समाज में इन्कलाब या बदलाव आये या नहीं हमारे अन्दर तो आ ही सकता है।
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