पहले शाश्वत प्रेम का मतलब समझाओ
मुझे कोई गुरू नहीं मिला, इसीलिये आध्यात्म विषयों पर बडे संकोच के साथ लिखता और विचार व्यक्त करता हूँ। हाँ लिखने पढने के मामले में एक बुजुर्ग पत्रकार से जरूर सीखा था और वह आध्यात्म विषय में ज्यादा रूचि नहीं रखते थे। उन्हें मन ही मन गुरू मानकर उनके बताये रास्ते पर चलता गया। उनका अपना दर्शन था पर मुझे लगता है कि वह अपने देश के प्राचीनतम आध्यात्म और दर्शन से कोई दूर नहीं था। धीरे-धीरे यह लगने लगा कि वह वाकयी एक बहुत बडे दार्शनिक थे। । जब तक पत्रकारिता के क्षेत्र में रहा उनके सानिध्य में कई चीजें देखीं और समझीं , और उनका महत्व उनसे अलग होने के बाद पता लगा।
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