लोग रचनाओं की चर्चा तो बहुत करते हैं पर उन पर आयी कमेंट भी कम महत्व की नहीं होती है-और कभी – कभी उससे भी ज्यादा । पिछली से पहले की रचना में मैंने लिखा था -
एक लम्हा सदियों का
इतिहास रच सकता है
एक शब्द भी रचना को
अमर कर सकता है
इस संबंध में हमारे मित्र समीर लाल ने यह कमेन्ट दीं। इसने मुझे बहुत प्रभावित किया। यह दोहा अपने आप में एक रचना का प्रतीक है- मेरी उपरोक्त पंक्तियों के भाव को प्रकट भी करता है।
बहुत सही-स्वामी समीरानन्द का दोहा सुनिये:
कविता में लिख डालिये, अपने मन के भाव
जो खुद को अच्छा लगे, जग के भर दे घाव।
दरअसल यह दोहा मुझे इतना अच्छा और प्रभावपूर्ण लगा कि मैंने सोचा कि क्यों न लोगों को इससे अवगत कराऊँ। साथ यह भी किस तरह एक दोहा संपूर्ण रचना को प्रभावित कर सकता है, यह लोगों को बताने के लिए । अब यह समीर लाल ही स्वामी समीरानन्द जीं हैं या कोई और यह तो वह जाने पर उनका दोहा मन को छू लेने वाला है और उस रचना से ज्यादा प्रभावपूर्ण है जिस पर यह लिखा गया है।
मेरा मानना है कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप ने कितना लिखा है-असली बात यह है कि आपने अपनी रचना से कितना प्रभावित किया। जब हम किन्हीं महान् लोगों की उक्तियों का उदाहरण देते हैं तो उनके संपूर्ण बयान या रचना को नहीं लेते बल्कि उसमे किसी सन्दर्भ कें कहे हुए खास वाक्य या कव्यांश को प्रस्तुत करते हैं। मैं अपनी रचनाओं पर आये कमेन्ट देखता हूँ तो उससे यह पता लगता है लिखने वाले व्यक्ति का उस समय क्या भाव रहा है? कई कमेन्ट मुझे बहुत प्रभावित करते हैं और कुछ नया लिखने की प्रेरणा भी मिलती है। कुछ कमेन्ट तो ऐसे भी होते हैं जो आपको नयी रचना की भुमिका भी प्रदान करते हैं।
इससे ठीक पहले वाली रचना समीर जीं के दोहे से प्रभावित होकर ही मैंने लिख डाली। इसलिये ही सोचा रचनाओं पर तो बहुत लिखते हैं कमेन्ट पर भी अपनी बात कह ही डालें-क्योंकि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हमारी रचना से तो कमेन्ट ही अच्छी है।