छोटी लकीर-बडी लकीर

blogvani
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 दूसरे की निन्दा कर अपने लिये 
सम्मान जताने का मोह 
यहाँ कौन छोड पाता है
पर दूसरे की लकीर को छोटा 
करने के लिये उससे बडी खींचने की
बजाय उस थूक से मिटाने वाला वाला
मूर्ख कहलाता है 
इतना छोटा विचार कुछ लोगों की 
समझ में नहीं आता है 
अपने सृजन  करने की बजाय 
दूसरे के दोष का प्रचार 
करना उन्हें भाता है 
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चूहे को मिल जाती है हल्दी 
तो चिल्लाता है 
‘मैं भी हो गया पंसारी ‘
इसी तरह शब्द-ज्ञान 
मिल जाता है जिन्हें 
अर्थ समझ में नहीं  आता 
ऐसे अल्पज्ञानियो की 
जाती है मति मारी 
समझते हैं स्वयं को विद्वान भारी 
कभी कसें इस पर ताना 
उस  पर फैके फिकरा 
हर बात पर मूँह करें टेढा
घर-परिवार और समाज 
के लिये करें संकट पैदा
अज्ञानी को समझाना सहज 
अल्प ज्ञानी  से वाद-विवाद 
पड़ता है अक्ल पर भारी    
 
 

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