वर्षा ऋतु:कहीं सूखा कहीं बाढ़




वर्षा ऋतु का वर्णन किताबों में
पढ़ते हुए कितना अच्छा लगता है
बादलों से रिमझिम बरसते पानी
और शीतल पवन बहने की चर्चा
करते हुए शब्द पढ़कर
मन बाग-बाग होने लगता है
सावन की काली घटा को चित्रित
करते शब्दों से हृदय
प्रसन्न होने लगता है
परन्तु किताबों के बाहर जमीन पर
शब्दों का चित्र अब
दृष्टिगोचर होते नहीं लगता है
वर्षा के बाद धरती से निकलती गर्मी
हवा में व्याप्त नमी
शरीर से बहता हुआ पसीना
अब सावन सूखा लगता है
गीत, गज़ल और कविताओं में
वर्णित और चित्रित
वर्षा ऋतु जैसे
क्यौं नहीं बरसता अब पानी
यह प्रश्न अब उठने लगता है
कोई कहता है
हरियाली को पशुओं की बजाय
आदमी चरने लगा है
पेड -पोधो की जगह
लोहे-लंगर के जंगल
खड़े करने लगा है
कोई देता है यह मत अपना कि
पेट्रोल-डीजल और जहरीले गैस के
धुंए से बिगड़ा है पर्यावरण
पूरी धरती हो गयी है गरम
कहीं आती है बाढ़ तो
कहीं अकाल बसता है
रहा होगा अतीत में
सावन का सौन्दर्य चर्चित
जिसे कवियों ने किये अपने
अनुपम शब्द अर्पित
अब तो बाढ़ में डूबते
और अकाल में तडपते लोगों की
कहानिया रोज पढ़कर
वर्षा ऋतु की महिमा
अतीत का पन्ना लगता है
Filed under: Art, Blogroll, Culture, Dashboard, Global Dashboard, Love, arebic, blogging, education, family, feature blog, freinds, hindi, inglish, internet, life, media, online jurnalism, public blog, shayree, sher-o-shayree, urdu, vews, अभिव्यक्ति, आचरण, आदमी, कविता, कशिश, क्षणिका, गर्मी, चरित्र, दृश्य, दृष्टिकोण, देश-दुनिया, नज़रिया, पर्यावरण, प्रतिबिंब, बिंब-प्रतिबिंब, मातृभाषा, लकीर, व्यंग्य, व्यंग्य कविता, शायरी, शेर-ओ-शायरी, समाज, हास्य-व्यंग्य, हिंदी, हिन्दी