पद, पैसा और प्रतिष्ठा

blogvani
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पैसा है तो पाने के लिये प्यार है
पद है तो खाने के लिये पकवान है
प्रतिष्ठा है तो पहचान है 
 राजा हो या रंक
अमीर हो या फकीर
सब फँसे हैं माया के फेर में
कोई दौड़ता है रेल  में 
कोई फँसता जेल  में 
दृष्टा है वह जो दूर बैठा 
देखता है हमेशा 
दिखता ऐसे है जैसे 
शामिल है वह भी खेल में
पर मन से लिप्त वह नहीं होता
किसी भी हालत में 
अपनी बुद्धि का संयम नहीं खोता 
माया के  खेल का होता 
उसे पूरा ज्ञान है 
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 जो ऊँचाई पर पहुँच जाता है
वह वैसे ही अक्लमन्द कहलाता है
उसकी कड़वी बोली में भी 
लोगों को मिठास नजर आता है 
उनके चक्षुऔं में चमकने के लिये 
हर कोई उनके इर्द-गिर्द मँडराता है
पद,पैसा और प्रतिष्ठा हैं
माया के वह रूप 
जिसमें हर आदमी फँस जाता है। 
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