अपनी भाषा के लिये किसी का मोहताज न होना
हिन्दी दिवस पर कई लोग बोले
हिन्दी की दशा बहुत खराब
अंग्रेजी इलाकों एकदम शोचनीय
यह न बताया कि अपने इलाक़े में
कौनसी अंग्रेजी है पूज्यनीय
तुम उठो -बैठो अंग्रेजी के साथ
कौन करेगा हिन्दी में बात
कैसे हो सकती है हिन्दी वंदनीय
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एक लेखक ने दूसरे से कहा
‘अंग्रेजी इलाक़े में हिन्दी की हालत
बहुत खराब है
चलो कुछ हिन्दी में पोस्टर
चिपकाये आते हैं
लोग आते - जाते पढेंगे
यहाँ तो हमारा लिखा कोई
पढता नही
जब भी देखो फ्लाप हो जाते हैं
दूसरा बोला
‘यार, अपने इलाक़े में भी तो
अंग्रेजी की हालत खराब है
पर अंग्रेज कभी पोस्टर चिपकाने
यहाँ नहीं आते हैं
जो चल रही है, जैसी चल रही है
उसकी डोली भी देशी गुलाम
उठाएँ जाते हैं
फिर अच्छा हो कि हम
करें आत्म मंथन
कुछ अच्छा चिन्तन
यहीं के हिट हमें फलेंगे
वह अंग्रेज कभी हिन्दी नहीं समझेंगे
उनकी उम्मीद पर क्यों हम
अपनी आशाओं का आसमान टिकाये जाते हैं
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भाषा का संबंध रोटी से होता है
और रोटी का पेट से
मातृभाषा के प्रचार का प्रयास है व्यर्थ
पूरी दुनियां में फ़ैल रहा है
बाजारवाद का दर्शन तुम रहना
अपनी गाँठ के पूरे
रखना अपना धन संभालकर
अपनी भाषा के लिये मोह्ताज न होना
तुम्हारी भाषा के लिये जो वह
कर रहे हैं उसमें हैं उनके अर्थ
हिंदी भाषा के शब्दों के अर्थ से नहीं
नजर में हैं हिंदी भाषी की जेब में अर्थ
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