रहीम के दोहे:मेंढक टर्राये,कोयल होती मौन
पावस देखि रहीम मन, कोइल साथै मौन
अब दादुर बकता भए, हमको पूछत कौन
कविवर रहीम कहते हैं कि जब वर्षा ऋतू आती है तो कोयल मौन धारण कर लेती है, यह सोचकर कि अब तो मेंढक टर्राने लगे हैं तो उनकी कौन सुनेगा।
अगर हम इसका भाव इस रूप में लेते हैं जम समाज में धन का प्रवाह सहृदय कलाकारों, रसिक हृदय कवियों kee ओर होने लगता है तब अनेक कलाकार और कवि मैदान में आ जाते हैं और मेंढकों की तरह टराने लगते हैं और उनको देखकर श्रेष्ठ और विद्वान, कलाकरौर कवि चुपचाप अपने को समेटकर अपने घर बैठ जाते हैं।
रहिमन प्रीति सराही, मिली होत रंग दून
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी दून
उसी प्रेम के प्रशंसा करना चाहिए जिसमें दोनों प्रेमियों का प्रेम मिलकर दुगुना हो जाता है, जैसे जल्दी पीली होती है और चूना सफ़ेद, परंतु दोनों मिलकर एक नया लाल रंग बना देता है। हल्दी अपने पीले रंग को और चूना अपने सफ़ेद रंग को छोड देता है।
इसका आशय यह है कि प्रेम करने वालों को अपना पहले का रूप त्याग देना चाहिऐ और एक नए रूप में आना चाहिऐ।
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