यूँ तो हारने के हजार बहाने हैं
पर घर में ही हार पर कितनी सफाई दो
यहां कौन माने हैं
बाहर जीत कर आये
तो शेर की तरह घर आये
कंगारुओं ने किया पलटवार
दो दिन में तारे नजर आये
नाम बडे हैं जिनके
दर्शन उनके छोटे तो हो जाने हैं
कहैं दीपक बापू
जीत का नशा इतनी जल्दी
उतर जायेगा किसे पता
स्कोर का कोई नाम लेवा नहीं था
फिर अब भीड़ जुटने लगी थी
लगता नही ज्यादा समय तक
चलेगा यह फिर खेल
अपने देश के क्रिकेट में पिटते देख कर
दुखी होने से ज्यादा अच्छा तो यह है कि
लोग अपने ब्लोग पर ही
शब्दों से खेलने लगें
अब तो इन्टरनेट पर ब्लोग
लिखने-पढने के दिन भी जरूर आने हैं
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