मुझे हिंदी ब्लोगों का रोमन में दिखने में कोई आपति नहीं है, और न ही लोगों के रोमन लिखने पढने में कोई दिलचस्पी है. मेरी प्रतिबद्धता अपनी हिंदी भाषा और देवनागरी से है पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपनी मर्जी पर दूसरों को चलने के लिए कहूं. बहुत कडी लगने के बावजूद वह यह कहने में मुझे कोई हर्ज नहीं है कि मैं रोमन लिपि में पढने वालों के लिए नहीं लिखता और अगर वह पढेंगे तो ठीक न ही पढ़ें तो ठीक है.
पहले एक चुटकुला लिखना सही लगता है. एक छोटा बच्चा बोलना नहीं सीख रहा था तो उसकी मां की सहेली ने उससे कहा’मैं तुम्हारे यहां अपना तोता छोड जाती हूँ वह तुम्हारे बच्चे को खेलते हुए बोलना सिखा देगा.’
वह अपना तोता वहीं छोड गयी. एक महीने बाद वह लौटी तो उसने देखा कि सहेली का बच्चा तो कुछ नहीं सीखा था बल्कि तोता ही राम-राम भूल गया और हुंगु….हुंगु बोल रहा था.
इधर जिस तरह रोमन पर चिट्ठा दिखने का प्रचार हो रहा है उससे तो डर लगता है कि कहीं वाकई अंतर्जाल पर देवनागरी लिपि का प्रचार ही बंद न हो जाये. ऐसा लगता है कि देवनागरी लिपि में शायद पाठक न मिल पाने की वजह से धीरज खत्म हो रहा है और अब रोमन लिपि पर ज्यादा ही भरोसा होने लगा है. मुझे इसमें भी कोई आपति नहीं है पर पिछले कुछ माह से वर्ड प्रेस के पाठकों का अध्ययन का रहा हूँ उससे लगता है कि मैं उन्हें सजग करता चलूँ कि मेरा चिट्ठा भी रोमन लिपि में दिख रहा है पर मैने उसे देवनागरी में ही लिखा है. अगर आप इसे रोमन में पढ़ रहे है और उसे देवनागरी में भी पढ़ सकते हैं तो वैसे ही पढे, यह मेरे ऊपर मेहरबानी होगी.
मुझे लगता है कि रोमन लिपि में इतने पाठक नहीं हो सकते जितने देवनागरी में मिलेंगे. मुझे तो लग रहा है कि कहीं लोगों के दिमाग में रोमन लिपि में हिंदी पढ़कर यह गलतफहमी न हो जाये कि यहाँ हिंदी ऐसे ही लिखी जाती है. कैसे? इसका जवाब यह है कि वर्डप्रैस के व्यूज देखकर पता लगता है कि अधिकतर पढने वाली रोमन लिपि में कबीर, चाणक्य, रहीम और आध्यात्म, लिखकर वहां आ रहे हैं. यह पिछले चार महीने से मैं देख रहा हूँ. और तो और मेरे चौपालों पर अपन्जीकृत ब्लोग भी इनकी पकड़ में आते हैं.इन सब लोगों को देवनागरी से अनजान मानना गलत होगा क्योंकि अभी यह सब लोगों को नहीं मालुम कि कोई हिंदी टूल भी उपलब्ध है. अब मैं सोच रहा हूँ कि कहीं इन जानकार लोगों को भी अगर वही रोमन लिपि वाली जगह दिखी और पढ़कर आधा-अधूरा आनंद लाकर तसल्ली करते रहे तो देवनागरी का प्रचार उतनी तेजी से नहीं होगा जितना हम समझ रहे हैं-होगा तो यह मेरा दावा है. अब एक संदेह और होता है कि अंग्रेजी में उनके लिखने के बाद उनके सामने हमारा कौनसा ब्लोग आयेगा-रोमन वाला या देवनागरी वाला.
हालांकि मैं ज्यादा चिंतित नहीं हूँ, क्योंकि हर भाषा की आत्मा उसकी लिपि होती है, तिस पर हिंदी तो और भी गजब की है उसे देवनागरी लिपि में ही लिखा और पढा जा सकता है. कमल कमल कमल और दीपक दीपक दीपक यह ऐक जैसे दिख रहे हैं, इन दोनों शब्दों को तीन अलग प्रकार से लिखा गया है. पर इन्हें रोमन में करें तो कोई भी कहेगा कि जिसने लिखा है वह अंग्रेजी में पैदल है. अपने ही ब्लोग को जब मैं पढ़ रहा था हो लग रहा था कि कई एसे शब्द हैं जिनकी स्पेलिंग रोमन में ग़लत है और गूगल वालों का हिंदी टूल हम हिंदी वालों पर तरस खाकर हिंदी में सही अनुवाद कर देता है. अभी यहाँ देंता शब्द चला जाता पर मुझे रोमन वालों का ख़्याल आया कि क्या पढेंगे? चलो इस बहाने भाषा में शुद्धिकरण की प्रवृति बढेगी.
अगर हिंदी की आत्मा देवनागरी है वैसे ही अंग्रेजी की आत्मा रोमन है. अगर मुझे कहीं अंग्रेजी का कोई शब्द देवनागरी में मिल जाता है तो थोडा दिक्कत आती है. कभी कुछ कहानियों में अंग्रेजी के वाक्य देवनागरी में पढने को मिल जाते हैं तो थोडा ध्यान से सोचकर पढते है पर अगर वही वाक्य रोमन में हो तो कोई समय नहीं लगता. हिंदी को रोमन में लिखना शायद कुछ लोगों को आसान लगता है पर पढ़ना उससे ज्यादा मुश्किल है. फिर उसकी गेयता का भी प्रश्न है. कम से कम मैं तो यही कह सकता हूँ कि अभी कोई निष्कर्ष निकालने से पहले यह देखना जरूरी है आगे इसका क्या स्वरूप सामने आता है. हिंदी चिट्ठों का रोमन में लिखने से ज्यादा गूगल का इंडिक ट्रांसलिटरेशन टूल की खुशी हुई. और यह लेख मैं उसी पर लिख रहा हूँ. साथ ही यह भी सोच रहा हूँ कि कहीं रोमन में पढने वाले स्पेलिंग की गलती निकालने लगे तो…….हिंदी वालों को ही इतना सब्र नहीं है बुध्दी और बुद्धि को चल जाने दें आखिर गूगल टूल पर कोई नया आदमी लिख रहा है. एसे में रोमन वालों ने भी यही तेवर दिखाए तो………मतलब हम जिस लिपि में लिख नहीं रहे उसका जवाब कहाँ से देंगे और किसी ने जब अपना प्रश्न पेश किया तो यह पता कैसे लगेगा कि किस लिपि वाले का सवाल है. उसने कहा कि तुमने कमल गलत लिखा है तो देवनागरी का लेखक अपने ही शब्द का उलट पलट का देखेगा पर वह तो उसका वैसा ही लिखा मिलेगा. देखो आगे-आगे क्या होता है.कही ऐसा न हो जाये देवनागरी में लिखने वाले इसे बात पर ज्यादा ध्यान देने लगें कि उनके रोमन में शब्द सही होना चाहिए और ऐसे मशगूल हो जाएँ कि देवनागरी लिपि में हिंदी को अंतर्जाल पर स्थापित करना याद ही न रहे.