रहीम के दोहे: संबंधियों से दूरी भली


टूटे सुजन मनाईये, जौ टूटे सौ बार
रहिमन फिर पोहिए, टूटे मुक्ताहार

कवि रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार सच्चे मोतियों का हर टूट जाने पर बार-बार पिरोया जाता है, उसी प्रकार यदि सज्जन सौ बार भी नाराज हो जाये तो भी उन्हें सौ बार मना लेना चाहिऐ क्योंकि वे मोतियों के समान ही मूल्यवान होते हैं।

नात नेह दूरी भली, तो रहीम जिय जानि
निकट निरादर होत है, ज्यों गडही को पानि

कवि रहीम कहते हैं कि यह बात ऐक दम तय है कि संबंधियों से दूरी भली होती है। उनके निकट रहने से गड्ढे में भरे जल की भांति निरादर होता है।

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