नए समाज के निर्माण की पहल करें

भारत एक बृहद देश है और इसमें तमाम प्रकार के समुदाय और समाज के लोग रह्ते है और यह कोई नयी बात नही है। अगर कोई नयी बात है तो वह यह कि हम आधुनिक समय में एकता की बात अधिक करनें लगें है और यह इस बात का द्योतक है कि भारतीय समाज में अब धर्म, विचार और वैयक्तिक विषयों पर झगड़े पहले की बनस्बित बहुत बढ़ गये हैं. शायद यही वजह है कि हम सब जगह शांति और एकता के नारे लगा रहे हैं.

देश के हालत कैसे हैं यह सब जानते हैं और किस तरह समाज में वैमनस्य के बीज बोए जा रहे हैं यह हम सभी देखते आ रहे हैं. फिर जब सब लोग शांति और एकता की बात करते हैं फिर भी हो क्यों नहीं पा रही है यह सोचने का विषय है. आखिर समाज में हम अपनी भूमिका किस रूप में निभा रहे हैं इस पर भी हमें आत्मंथन तो करना चाहिए. देश के सारे बुद्धिमान लोग एक भारतीय समाज बनाने की बात तो करते है पर उसकी कोई कल्पना उनके दिमाग में नहीं है और शांति और एकता केवल एक नारा बनकर रह गये हैं. फिर हम आ जाते हैं इस बात पर कि सब समाजों को एक होना चाहिए. सवाल यह है के समाज का कोई अपने आप में कोई भौतिक रूप नहीं होता और व्यक्ति की इकाई उसे यह संज्ञा प्रदान करती है तो क्यों न हमें व्यक्ति तक जाकर अपनी बात कहना चाहिए.

अगर हम एक भारतीय समाज की बात कर रहे हैं जिसमें सब समाज उसकी इकाई है तो हमें उनके वर्त्तमान स्वरूप को भी समझना होगा. समय ने इन हमारे सभी समाजों को कितना खोखला कर दिया है इस पर दृष्टिपात किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते. पहले समाज के संगठन बहुत मजबूत होते थे और लोग अपने से बडे, प्रतिष्ठित था विद्वान लोगों की बात मानते थे तब आर्थिक स्वरूप भी एसा नहीं था और मध्यम वर्ग अपनी बौद्धिक प्रभाव से दोनों वर्ग पर अपना नियन्त्रण रखता चलता था. लोग अपने समाज के दबंग लोगों से हमेशा तकलीफ में राहत मिलने की उम्मीद होती थी. अगर देखा जाये तो समाज के सबसे अधिक आवश्यकता आदमी को बच्चों के विवाह के समय होती है और इसमें भी कोई अधिक पहले परेशानी नहीं होती थी. अब बढते भौतिकतावाद ने रिश्तों को लोहे-लंगर के सामान से बाँध दिया है-और आजकल तो हालात यह है कि लड़के को कार मिलनी है लडकी वाले को देनी है. रिश्तों की औकात अब आर्थिक आधार पर तय होने लगी है. पहले भी रिश्तेदारों में अमीर गरीब होते थे पर आज अन्तर पहले से बहुत ज्यादा हो गया है. समाज के शक्तिशाली लोगों से गरीब और कमजोर तबका अब कोई आशा नहीं कर सकता. अत उनकी पकड़ समाजों पर वैसी नहीं है जैसे पहले थी

कहने का तात्पर्य यह है कि समाज टूटे पडे हैं और कोई नया समाज बन ही नहीं रहा और चूंकि हम लोगों को नाम के लिए ही सही उनकी छात्र छाया में रहें की आदत हो गयी है इसलिये उनके नाम पर उसके भग्नावशेषों में रह रहे हैं. जो लोग समाजों में एकता और शांति की बात करते हैं वह सभी समाजों के खोखलेपन को जानते हुए भी चर्चा नहीं करते. अपने समाज की आलोचना की तो वह नाराज होंगे और दूसरे की करने पर तो वैसे ही झगड़े का अंदेशा है ऐसे में नारा लगाकर रहना ही सबको श्रेयस्कर लगता है. मेरा आशय यह कि एकता व्यक्ति की व्यक्ति से हो सकती है पर समाज की एकता तो वैसे भी एक नारा ही लगती है फिर खोखले और बिखर चुके समाज अपने अन्दर तो एकता कर लें फिर दूसरे समाज से करने की सोचें.

मैं देख रहा हूँ लोग अब नए समाज की स्थापना करना चाहते हैं पर उनके मार्गदर्शक बुद्धिजीवी अभी भी उन्हें पुरानी पहचान पर एक होने का संदेश दे रहे हैं जो कि अब आम आदमी कि दृष्टि से अव्यवहारिक हो चुके हैं. अब अगर इस देश के बुद्धिमान लोग चाहते हैं कि इस देश में एकता और शांति से लोग रहे तो उन्हें नए समाज के निर्माण के लिए कार्य करना चाहिए. यह प्रक्रिया कोई एक दिन में पूरे नहीं होगी पर उसको शुरू तो किया जा सकता है, और इसके परिणाम भी अभी से दिखना शुरू होंगे. हमें केवल इस बात पर विचार करना चाहिए कि आम आदमी की सामाजिक परेशानी किस तरह की है और वह क्या चाहता है? हमें कभी न कभी तो समाजों में आये खोखलेपन पर दृष्टिपात करना ही होगा, जिनको हम देखते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं. इन सब पर विचार करके ही यह तय करना होगा कि हम समाज का कोई नया रूप देखना चाहिते हैं या इन्हीं भग्नावशेषों से ही एकता और शांति करना चाहते हैं

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