बेनजीर की वापसी और धमाके
बेनजीर की पाकिस्तान वापसी पर उनके समर्थकों द्वारा किया गया स्वागत और आतंकवादियों के विस्फोट दोनों ही आज विश्व भर के समाचारों में छाये हुए हैं. इसका कारण यह है की यह सब जान चुके हैं की जब तक पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों पर नियंत्रण नहीं पाया जायेगा तब विश्व के किसी भी हिस्से में मौजूद आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता हर देश वहाँ के वर्तमान शासकों को प्रसन्न करने में लगे होने के साथ भविष्य में भी अपने लिए गोटियाँ बिठाने में लगा है. पाकिस्तान केवल नाम का ही स्वतंत्र देश है अब इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है-क्योंकि उसके राजकाज में बाहरी हस्तक्षेप अब खुले में होने लगा है. जब पिछली बार नवाज शरीफ वापस लौटे थे तू उन्हें वापस भेज दिया गया, और उन्हें वह करार दिखाया गया जिसमें उन्होने दस साल देश में कदम न रखने की बात मानी थी और उसमें गवाह था कोई और देश.
बेनजीर की वापसी में अमेरिका का हाथ है और इसलिए पाकिस्तान के कट्टरपंथी उनके विरोधी हैं. इसके अलावा जिन्हें मुशर्रफ साहब ने ही हिंसा का पाठ पढाया वह जेहादी अब उनके लिए संकट बन गए हैं और बेनजीर के साथ उनके समझौते की चर्चा ने भी कट्टरपंथियों को उनका बैरी बना दिया है. इन विस्फोटों में इतने सारे लोगों की दर्दनाक मौत इस बात को दर्शाती है की अब पाकिस्तान भी अब उस हिंसा की चपेट में बुरी तरह फस चुका है जिसका जनक उसे ही माना जाता है.
पाकिस्तान में वैसे तो कट्टरपंथ का ही बोलबाला है पर कुछ कम(जिन्हें बाकी विश्व उदारवादी कहता है) और कुछ ज्यादा कट्टरपंथियों के बीच संघर्ष अब तेज हो गया है. वैसे मुशर्रफ स्वयं आधुनिक विचारधारा होने का दावा करते हैं पर धर्म निरपेक्षता की नीति से उन्हें भी एलर्जी है-यह बात वह खुद कह चुके हैं . अमेरिकी दबाव के चलते वह अधिक कट्टरपंथियों के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. अब उन्हें देश में लोकतंत्र बहाली की याद आ रही है और उन्होने बेनजीर की देश वापसी का रास्ता साफ किया. हालांकि उन्होने बेनजीर को अभी आने से मना किया पर तेज तर्रार बेनजीर ने उनकी बात नहीं मानी और यह दिखाने की कोशिश की ऐसे गुप्त समझौते के बावजूद उन पर सैनिक शासन का कोई दबाव नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है की पाकिस्तान के आधुनिक समाज में उनकी वापसी से लोकतंत्र की बहाली की आशा की जो किरण जागी है जो कट्टरपंथियों के दबाव से मुक्त होना चाहता है. देश में वैसे तो लोकतंत्र और कट्टर पंथ के बीच संघर्ष चल ही रहा है. दुर्भाग्ययह रहा है की पाकिस्तान में लोकतंत्र समर्थकों के पास कोई कद्दावर नेता नहीं था औरकट्टरपंथियों को भी मुशर्रफ के मुहँ फेर लेने से ऐसी ही स्थिति देखनी पडी है. बेनजीर की वापसी से लोकतंत्र के समर्थकों को एक कदावर नेत्री मिलने से वहाँ के कट्टरपंथियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक हैं और यह विस्फोट उसी का ही परिणाम है. अब पाकिस्तान की राजनीति दोनों सिरों पर पुख्ता हो गई है एक तरफ मुशर्रफ और दूसरी तरफ बेनजीर. ऐसे में मुशर्रफ से जूझ रहे कट्टरपंथी अपने को हाशिये पर खडा अनुभव कर रहे हैं.
इस हादसे की दृश्य चैनलों पर देख कर दुख हुआ. आखिर बेनजीर लोकतंत्र के जरिये ही अपना रास्ता तलाश कर रहीं है और उन्हें चुनाव में प्रचार कर रोका जा सकता है इसलिए इस तरह का हमला अनुचित है. इस हादसे में जो लोग मारे गए वह कोई जंग नहीं लड़ रहे थे पर उन्हें हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया गया. अब तो भारत और पाकिस्तान में इतने विस्फोट हो चुके हैं कि लोग पूरे नाम तक नहीं याद रख पाते. इनमें हमेशा ही ऐसे लोग मरते हैं जिनका किसी विवाद से सीधा संबंध नहीं होता. पाकिस्तान और भारत की आम जनता में एक स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रूप से मन मुटाव हो सकता है पर इस तरह के हादसे एक-दूसरे के साथ होना उनको पसंद नहीं है. जिस तरह ऐसे विस्फोट कर निर्दोष आदमी को मारा जाता है वह अत्यंत घृणित कृत्य है और ऐसा केवल कायर ही करते हैं.
बहरहाल बेनजीर की वापसी से पाकिस्तान में अब राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ेंगी और उनकी वजह से विश्व में चर्चा होगी यही तो मुशर्रफ चाहते हैं कि विश्व में अब पाकिस्तान के लोकतंत्र की भी चर्चा हो, जिसमें उनके पिछलग्गू नेता सफल नहीं हो पाए थे. वह चुनाव लडे जीते मंत्री भी बने पर विश्व में फिर भी पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक देश नहीं कहलाता था.बेनजीर के परिदृश्य में आने से अब उसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पूरे विश्व की नजर रहेगी.
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