सच को बैसाखियों की जरूरत नहीं-हास्य कविता

पत्थरों पर लिखी इबारत भी
इतिहास का सच बयान नहीं करती
जिसे लिखना आता है
वह कुछ भी लिख सकता है
लिखने पर चलती है उसीकी मर्जी
पुराने समय से चलती कथाओं को भी
इतिहास मानना होगा गलती
क्या हम नहीं देखते
अपने सामने ही कैसे रचे जाते हैं स्वांग
कितने झूठ गढ़कर एक सच बनाया जाता है
ईमान की लाशों पर बेईमानी को
शिखर पर पहुंचाया जाता है
झूठ का दरिया बहता था पहले भी
और अब भी
सच तब भी किनारे खडा रहता था
और अब भी मुस्कराता है
झूठ तब भी इतिहास के रूप में
रचा गया हो सकता है
जैसे अब रचा जाता है
और सच को तो कभी
बैसाखियों की जरूरत नहीं हुआ करती
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