वाशिंगटन स्थित वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के मध्यम वर्ग में सुस्त और आश्रित जीवनशैली को अपनाने से लोगों में वह बीमारियाँ पैदा हो रहीं हैं जो पहले कभी पश्चिम यूरोप वासियों को ही हुआ करती थी. ऐसा नहीं है कि इस रिपोर्ट से पहले कभी कोई चर्चा इस विषय पर नहीं हुई पर लगता है हमारे देश से ज्यादा विदेश के लोग हमारी चिंता कर रहे हैं कि हम उन संकटों में न फंसे जिससे निजात पाने के लिए वह जूझ रहे हैं.
वैसे इस रिपोर्ट पर जब उन्होने काम शुरू किया होगा और जब उसके निष्कर्ष प्रस्तुत किये होंगे तब से लेकर तो पता नहीं कितना पानी गंगा में बह गया होगा. इसलिए वह वर्तमान में ही ‘हो रहीं हैं’ शब्द लिखा गया है. हमारा देश तो बहुत पहले ही बहुत सी ऐसी बीमारियों की चपेट में आ गया है जिनकी चर्चा ही बहुत बाद में होगी. सबसे अधिक तो लोगों में मानसिक तनाव व्याप्त है-और समाज में जो वैचारिक धरातल पर खोखलापन आया है उसका आंकलन करने वाला कौन है? मनुष्य की पहचान है उसका मन और अगर वही अस्वस्थ है तो वह कैसे स्वस्थ हो सकता है. पहले तो बस संकट बडों तक ही सीमित था और बच्चों के लिए कहते थे कि ‘ अभी तो बच्चे हैं खेलने दो यही तो इनके दिन हैं’-पर अब फास्ट फ़ूड के उपयोग से उन्हें जो बीमारियाँ होतीं है वह उनका बचपन छीनकर उन्हें बुढापा प्रदान कर देती हैं. हम भारतीय वैसे तो मर्यादा और अनुशासन की बात तो बहुत करते हैं पर जीवनशैली में उससे परहेज करते हैं.
टीवी,मोबाइल.कंप्यूटर,फ्रिज और पेट्रोल चालित वाहन उपयोग के लिए साधन मात्र है न कि साध्य! हमें मिल गया है तो ऐसा लगता है कि वही सब कुछ है. मनोरंजन की जरूरत है तो टीवी देखें न कि इसलिए देखें कि घर में पडा है तो देखें. मोबाइल है सूचना के आदान प्रदान के लिए न कि उससे चिपक कर लोगों को बताने के लिए कि हमारे पास है-उस पर बात तो कर रहे हैं पर वह कितनी सार्थक है इस पर भी विचार तो करना चाहिए. कंप्यूटर रचनात्मक काम करने वालों के लिए एक बहुत अच्छा साधन है पर जो लोग इंटरनेट पर काम करते देखता हूँ तो हंसी आती है. एक साइबर कैफे में जाकर मैंने देखा वहाँ स्कूल की ड्रेस पहने छात्र बैठे थे और उनकी खुली हुईं साइटें देखीं तो हैरान हो गया-वह किसी भी दृष्टि से उनके शैक्षणिक विषय से संबंधित नहीं थीं और अगर उन्हें मनोरंजक भी कहा जाये तो हास्यास्पद ही होगा क्योंकि उससे भी कुछ शिक्षा मिलती है और मुझे नहीं लग रहा था कि वह दोनों में से कोई काम कर रहे थे सिवाय अपना कीमती समय खराब करने के. पेट्रोल चालित वाहन कहीं पहुंचने का साधन है और उसका उपयोग क्या वाकई उसके लिए हो रहा है. कहीं जाना है इसलिए गाडी का उपयोग होना चाहिए न कि इसलिए कि वाहन है तो कहीं जाना है.
वैसे तो इस देश में गरीबी बहुत है और सबकी आरामदायक जीवन शैली है यह कहना गलत है पर मध्यम वर्ग समाज की एक बहुत बडी शक्ति होता है और उसे वह व्याधियां घेर रही हैं जिससे उसकी स्वयं की तकलीफें बढाएगी और उसका तो वैसे भी आर्थिक आधार हवा में होता है जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक खूब कमा लो और जो वह डावांडोल हुआ कि गरीबी के वर्ग में शामिल होते देर नहीं लगेगी. लोग चल-फिर रहे हैं और लगता नहीं है कि उनको कोई बीमारी है पर वह केवल इसलिए कि उनके पास वाहन हैं और थोडा पैदल चलने के लिए कहा जाये तो उनके हाथ-पाँव फूल जाते हैं-सबसे अधिक तो जो मानसिक तनाव है उसका तो कोई पैमाना नहीं है. मैंने एक रिपोर्ट पढी थी कि लोगों की बहुत बड़ी ऐसी संख्या है जो मनोरोगी हैं और यह उनको खुद नहीं मालुम. मनोरोगी का अर्थ एकदम पागल होना नहीं होता यह समझ लेना चाहिए. अकारण चिंता, उठते-बैठते घबराहट और नींद न आना,अकेले में घबडाना तथा फालतू बडबडाना और अधिक बोलना भी इसके लक्षण है.
शरीर का सीधा नियम है जितना चलाओगे चलेगा और जितना आराम करोगे उतना ही कमजोर होगा. आहार-विहार , विचार, निद्रा और काम करने के तय नियमों का पालन करते हुए अनुशासित जीवन शैली ही ऐसी बीमारियों का सामना करने की शक्ति दे सकते हैं और दवाईयों से कितना आराम मिलता है यह सब जानते हैं.