१.धर्मज्ञ राजा को जातियों, धर्मों, राज्य के धर्मों, श्रेणी धर्मों(व्यवसाय के प्रकार से नियत धर्मों) तथा कुल धर्मों को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिऐ.
२.जाति, देश और कुल धर्मानुसार अपने-अपने कामों को करने वाले तथा अपने-अपने कार्य में स्थित होकर दूर रहते हुए भी इस लोक में प्रिय हो जाते हैं.
३.राजपुरुष को न तो स्वयं झगडा करना चाहिए न ही किसी के झगडे को अनदेखा करना चाहिऐ.
४.राजपुरुष को धर्म का अनुसरण करने वाले तथा सदाचरण करने वाले द्विजातियों द्वारा प्रमाणित एवं देश, कुल तथा जाति के अनुकूल ही झगडे का निर्णय करना चाहिऐ.
५.जिस सभा में अधर्म द्वारा धर्म को दबाया जाता है और वहाँ मौजूद सदस्य अन्याय को दूर नहीं करते वहाँ जिस कांटे से धर्म को दबाया जाता है वही बाद में सदस्यों को कष्ट पहुंचाता है.
६.ऐसी सभा में जहाँ सभासदों के सम्मुख ही झूठ जब सत्य को तथा अधर्म भी धर्म को दबाता तो उस पाप के कारण सभासद भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं.
७.राजपुरुष द्वारा उचित न्याय नहीं होने पर अधर्म का पहला चौथाई भाग अधर्म करने वाले को, दूसरा चौथाई यह सब देखने वाले को, तीसरा चौथाई भाग राज्य की तरफ से नियुक्त सदस्यों को था चौथाई भाग राज्य जो मिलता है.
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