सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।
निन्दक ते कुता भला, हट कर माँडै सहार
कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार
निंदा करने वाले आदमी से बहुत भला तो कुता है, जो कि दूर हटकर भौंकता है। परंतु कुत्ते से भी अधिक क्रोध करने वाल निंदा बुरा है जो अपने गुरू को गाली दिलवाता है। लोग सोचते हैं कि जब यही ऐसा अज्ञानी और परनिन्दा करने वाला है तो इसका गुरू भी ऐसा ही होगा।