अपनी पोस्ट जबरन पढाने का औचित्य

आज मैंने एक चौपाल से जुडे वरिष्ठ ब्लोगर का एक पत्र देखा जिसमें एक ब्लोगर द्वारा अपनी रचनाएं जबरन भेजने के कारण उन्हें निरंतर मित्र समूह से निकाला जा रहा है ऐसा सन्देश दिया गया है. उसमें उन्होने बहुत गुस्सा व्यक्त किया गया है. ऊपर तो वरिष्ठ ब्लोगर का ईमेल पता दिया गया था पर उन्होने भेजा या उन ब्लोगर महोदय ने यह मैं नहीं जानता. मेरा माऊस डीलीट पर चला गया तो अब वह मेरे पास नहीं है. पर मैंने उसे पढा था.

इससे पहले मैंने एक चौपाल के एक कर्णधार की ऐसी व्यथा पढी थी. मुझे हैरानी है कि लोग अपने को लेखक के रूप में स्थापित करने की जल्दी क्यों कर रहे है? मुझे यह पसंद नहीं है कि किसी को अपना लिखा पढ़ने के लिए कहूं. एक बार की बात है की एक अखबार में मेरा एक लेख छपा था और उसी दिन मैं अपने एक मित्र के घर गया तो उसका अख़बार टेबल पर रखा था. मेरी उससे बातचीत हुई पर मैंने उसे नहीं बताया कि उसमें मेरी रचना छपी है. कुछ दिन बाद वह मुझसे बोला”यार, तुम उस दिन आये थे तो बताया क्यों नहीं कि तुम्हारा व्यंग्य छपा है?’

मैंने कहा-”मैं लिखने में भी मेहनत करूं और पढाने पर भी? ऐसा मैं नहीं कर सकता.

मैं लिखने में श्रम करने के बाद अपनी उस रचना के पीछे फिर नहीं जाता. न तो किसी को पढ़ने के लिए कहता हूँ और उसके अच्छे और बुरे होने के निर्णय पर अपनी दिमागी ऊर्जा खर्च करना भी मुझे पसंद नहीं है. लिखने का एक अलग मजा है और उसे पूरा लेकर आप किसी को उसे दूसरे को पढ़ने के लिए प्रेरित करें तो इसका मतलब यह कि आपने लिखने का आनंद नहीं उठाया. मुझे वरिष्ठ ब्लोगर की नाराजगी में कोई दोष नहीं दिखाई देता. जहाँ तक मैं समझता हूँ जब सहन करने की सीमा खत्म हुई होगी तब ऐसा कडा कदम उठाया होगा. उनकी कोई वेब साईट है जिस पर मेरे ब्लोग हैं पर मैंने कभी उनको ईमेल नहीं किया. जब कोई आवश्यक काम हो या परेशानी है तो मैं चौपालों पर अपने सन्देश भेजता हूँ और आज तक मुझे सकारात्मक उत्तर ही मिले है. कभी अपने विचार व्यक्त करता हूँ तो किसी के गुस्से की चिंता नहीं रहती. मैं अपने लेखन और संपादन पर भरोसा करता हूँ और लोकप्रियता के लिए किसी के आगे गिडगिडाने से अच्छा है कि अपनी पोस्ट लिखो. जिसे पढ़ना है पढेगा नहीं पढता न पढे. अगर किसी ने मित्रतावश कोई ईमेल किया तो उसको पीछे पड़ जाओ, यह तो ठीक नहीं लगता. कभी-कभी तो लगता है कि कुछ ब्लोगरों को अपने लिखे का परिणाम की बहुत जल्दी है.
चौपालें आखिर बनी किसलिए हैं और अगर उन पर भरोसा नहीं है तो फिर मुझे कुछ नहीं कह सकता. मैंने देखा है कि कई पढ़ने वालों ने मेरे ब्लोग बहुत समय देखे तो फिर वह पीछे की रचनाएं देखकर फिर एक कमेन्ट में लिखते हैं कि ताज्जुब है कि आपका ब्लोग हमने इतने दिन से देखा क्यों नहीं?
कई नये ब्लोगर तो यहाँ तक कह देते हैं कि आप जैसा लेखक भी यहाँ है हमें देखकर आश्चर्य होता है. मुझे खुशी होती है पर इसका मेरे लिखने से कोई संबंध नहीं होता. जब मैं अपनी पोस्ट लिखता हूँ तो मुझे इस बात की परवाह नहीं होती कि उसे कौन पढेगा? ब्लोगरों और पाठकों में सब तरह के लोग हैं और अगर कमेन्ट के आधार पर ही अपनी रचनाओं का स्वरूप तय किया जायेगा तो फिर दायरों में सिमट जाएंगे और तब लेखक नहीं कहलायेंगे. मैं तो अपने मित्रों को भी ब्लोग का पता तब तक नहीं देता जब तक वह मांगते नहीं.
अपनी पोस्ट जबरन किसी को भेजना मतलब यह है कि हमें उस पर भरोसा नहीं है. इसके विपरीत प्रभाव भी हैं आपकी ईमेल पर भेजी रचना भी अपना महत्त्व खो बैठती है क्योंकि पढ़ने वाले का दिमाग तो पहले ही खराब हो जायेगा तो पढेगा क्या और समझेगा क्या? अच्छा यही है कि अपने लिखने के साथ दूसरों का पढें भी. चौपाल पर रहते हुए अगर वहाँ के किसी सदस्य को ईमेल से अपनी रचना भेजते हैं तो इसका मतलब यह है कि आपको न तो उस पर यकीन है कि वह उन चौपालों पर आता है और आप खुद भी नहीं जाते यह तो तय ही है.जो ब्लोगर चौपालों पर नहीं जाते मुझे नहीं लगता कि इस विधा में पूरी तरह पारंगत हो पायेंगे.

आखरी बात यह कि ब्लोग बनाने और चौपाल पर आ जाने का मतलब बहुत बड़ा रचनाकार समझना एक गलती होगा. इसका फैसला पाठको पर ही छोड़ देना होगा. अगर हम सोचें के हमें तो लिख दिया अब तो पढ़ने वाले पढेंगे और हमें सराहेंगे तो दूसरी बडी गलती होगी. लोगों का प्रेम मुझे बहुत अच्छा लगता है और अंहकार बुरा. मैं एक लेखक हूँ और हर पोस्ट को लेखक की तरह ही पढता हूँ और देखता हूँ कि कौन क्या है? हर लिखने वाला लेखक नहीं होता और जो लेखक होता है वह अपनी रचनाएं लेकर नहीं फिरता. मैंने जो कहा है वह एक लेखक की तरह ही कहा है और किसी को इससे असहमति है तो मुझे इसकी परवाह नहीं है. तुम लिखो मैं पढूंगा और भी पढेंगे पर यहाँ सब मर्जी के मालिक है और जबरदस्ती कर अपने मित्र मत गंवाओ. अगर आदमी चैंटने लगता है तो उसके घर के लोग दूर भागते हैं बाहर के लोग सामने से आता देखकर रास्ता बदल देते हैं.

3 Comments

  1. mamtasrivastava1
    Posted December 22, 2007 at 22:18 | Permalink

    आपने ठीक कहा है कि किसी को पढ़ने के लिए जबरन मजबूर नही किया जा सकता है ।

    हर लिखने वाला लेखक नहीं होता और जो लेखक होता है वह अपनी रचनाएं लेकर नहीं फिरता।

    बहुत सही बात कही है।

  2. drdwivedi1
    Posted December 23, 2007 at 01:21 | Permalink

    आप का विचार सही है। मैं ने भी आप का आलेख शीर्षक पढ़ कर ही इसे खोला है, और अब लगता है आप को रोज ही पढ़ना पड़ेगा। अब तक आप के लेखन से वंचित रहने का अफसोस रहेगा।
    दिनेशराय द्विवेदी

  3. mehhekk
    Posted December 23, 2007 at 01:48 | Permalink

    yes very true said and put the thoughts in right way.blogging or writing should be coming from within,it must be for our own happiness,to put our thoughts in words.if someone likes it they wil definetly read.writing should be pleasure,rather than obssesion.


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