वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
यादों पर ग्रहण लग जाता है
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि
कौनसा सा वादा बरसाया जाये
किस याद को लोगों के दिमाग
से भुलाया जाये
तमाम के लगाते नारे रचकर
हवाई किला किया जाता है खडा
जो कभी खुद नहीं चलते
उसके दरवाजे कितने भी आकर्षक
रास्ता एक कदम बाद दीवार से टकरा जाता है
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए
अभिनय करते हुए जजबातों के
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए
अँधेरे का डर दिखाकर
अपना करते हैं व्यापार
कहते हैं कि दूध का जला
छांछ भी फूंक कर पी जाता है
पर यहाँ तो आदमी कई बार
जलने के बाद भी आदमी
फिर पीने के लिए जीभ जलाने आ जाता है
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