समाज को टुकडों-टुकडों में बांटकर
उसे अब दिखाने के लिए सजाते
हर टुकड़े पर लगते मिटटी का लेप
और रंग-बिरंगा बनाते
बालक, वृद्ध, महिला, युवा, और अधेड़ के
कल्याण की लगाते तख्तिया और
तरह-तरह के नारे लगाते
इन्हीं टुकडों में लोग अपनी पहचान तलाशते
स्त्री से पुरुष का
जवान से वृद्ध का भी हित होगा
इस सोच से परे होकर
कर रहे हैं दिखावे का कल्याण
फिर भी समाज जस का तस है
चहूँ और चल रहा अभियान
असली मकसद तो अपने घर भरना
वाद और नारा है कल्याण
अगर समाज के थाली के तरह सजा होता
तो दिखाने के लिए भरने पड़ते पकवान
अब कोई पूछता है तरक्की का हिसाब तो
समाज के टुकडों को जोड़ता दिखाते
तोड़ने और बांटने की कला
देखकर अब तो अंग्रेज भी शर्माते