चजई-हिन्दी ब्लोग में पुराने नियम खारिज योग्य
जब इस देश में अंतर्जाल शैशव स्थिति में था तब कुछ उत्साही लोगों ने हिन्दी के अपने ब्लोग बनाकर उसे अंतर्जाल पर बढाया। वह पढे-लिखे शिक्षित एवं सहज भाव के थे और उनमें ललक थी हिन्दी को अंतर्जाल को लाने की। देश में लेखकों की कमीं नहीं पर कंप्यूटर का कार्यसाधक ज्ञान रखने वालों की बहुत कमी है और उससे भी अधिक इंटरनेट पर काम करने वालों की कमी है। इसका लाभ उस समय के ब्लोग लेखकों को यह मिला कि अब अपने अनुभव और उससे मिली सफलता के कारण उनका सब सम्मान करते हैं। इन ब्लोग लेखकों में दूसरे लोगों को अंतर्जाल पर लाने की जो भावना थी उसका परिणाम यह है कि मेरे जैसा लेखक यहाँ पर आ गया। शुरू के इन ब्लोग लेखकों में कल्पनाशीलता वैसी नहीं थी जो किसी आम लेखक में होती है। ऐसे में एक-दो ब्लोग लेखक जो चालाक किस्मं के हैं उन्होने कई ऐसे पैमाने बनाए जो ब्लोग के अंग्रेजी स्वरूप पर आधारित थे और हिन्दी में उन्हें अब साहित्यकारों के अनुकूल नहीं थे। सब ठीक चलता अगर पुराने ब्लोगरों ने अपने बनाए इन नियमों को ब्रह्म वाक्य बताकर कवियों और लेखकों को अपमानित करने का प्रयास नहीं किया होता-और यह ब्लोग लेखकों और लेखक ब्लोगरों का लंबे समय तक चलने वाले द्वंद मेरे मत्थे पड़ गया है और उससे जूझने का मन मैंने बना लिया है क्योंकि मुझे आगे ले जाने वाला रास्ता यहीं से जाता है ।
कहीं ब्लोग का मूल्यांकन की बात आये तो कहा’कविता एक ब्लोग वहाँ शामिल नहीं किये गए”और फिर मेरी रेटिंग कम दिखाकर मेरी उपेक्षा करने की कोशिश की। जिन पाठकों और इस बात से अनजान ब्लोग लेखकों ने मुझसे पूछा है कि ”आप गुस्सा क्यों हैं” यह उनका जवाब है कि मैं गुस्से में नहीं हूँ बल्कि अपने रचना धर्म का पालन कर रहा हूँ और इसी क्रम में प्रस्तुत हैं उनके नियमों को खारिज करती हुए यह पोस्ट।
इन सीमित कल्पना वाले ब्लोगरों ने नियम बनाया कि कोई भी पोस्ट २५० शब्दों का इसे खारिज किया जाता है। हिन्दी का स्वरूप अंग्रेजी से अलग है। अंग्रेजी में गद्य की प्रधानता है और हिन्दी में पद्य की। हमारे सारे प्राचीन ग्रंथ पद्य में है यानि कम शब्दों में ऐसी बात कहना जो प्रभावी रूप से काम करे। कहना यह है कि कविता हमारे खून में हैं न कि तमाम की तरह बकवाद लिख कर दूसरे को गुमराह करना। कबीर, रहीम और तुलसी की पद्य रचनाएं है और उनका पूरा विश्व कायल है। सीधा आशय यह है कि कविता अगर प्रभावी है तो उसका महत्व हिन्दी में भाषा में बहुत है। मेरे जो ब्लोग मित्र और पाठक मुझे प्यार कर रहे हैं वह हास्य कविताओं की वजह से कर रहे हैं तो क्या आप मुझे केवल अपमानित करेंगे कि आप पुराने हैं। नहीं! आप अपनी दुकान चलाईये, पर कविता को अलग रखनी की बात भूल जाइये। हम साहित्य ब्लोग तो अपने नियम से चलाएंगे तुम्हारे नियमों से नहीं।
हिन्दी में पोस्ट के शब्द की संख्या नहीं प्रभाव देखा जाना चाहिए, कतिपय चालाक ब्लोगर इसका विरोध करेंगे क्योंकि उनको पढ़ने से कोई मतलब नहीं है, क मुझे संदेह है कि उन्होने यह काम कभी किया हो। इसके बावजूद समझदार वरिष्ठ ब्लोगर जिनमें कई स्वयं भी बहुत अच्छे लेखक हैं इस बात पर विचार कर सकते हैं। फिर भी शब्दों की सीमा रखनी है तो गद्य रचनाओं में शब्द की संख्या कम से कम पांच सौ और पद्य रचनाओं में सौ शब्द होना चाहिए और उसके बाद भी कुछ क्षणिकाएँ जो प्रभावीं हों उन्हें मान्य किया जाना चाहिऐ। कतिपय ब्लोग लेखक जो अपनी सीना तानकर हम साहित्यकारों पर बरस रहे हैं उन्हें समझना चाहिऐ कि अब उनके यह हलके और हिन्दी साहित्य के लिए अपमानजनक पैमाने किसी की मतलब के नहीं है। हिन्दी भाव की भाषा है मोलभाव की नहीं, और मेरे बनाए इस नियम पर चलकर ही हिन्दी का ब्लोग जगत आगे जाने वाला है।
अब इन ब्लोगरों के बनाए कुछ और नियम
१.हित्ट्स नहीं देखेंगे
२.व्युज नहीं देखेंगे
३.शिल्प देखेंगे
४.सज्जा देखेंगे
यह चारों नियम खारिज किये जाते हैं। हिन्दी भाषा में कथ्य महत्वपूर्ण होते हैं। हर पांच कोस पर बोली बदल जाती हैं पर उसका कथ्य सारे देश में फैलता है। कबीर और तुलसी को हिन्दी का कवि माना जाता है कई ऐसे हिन्दी भाषी हैं जो उनके सरल हिन्दी भाषा के अनुवाद पढ़ते हैं। कथ्य महत्वपूर्ण है। हित्ट्स और व्युज उसको मिलते हैं जो पठनीय है। मेरी कवितायेँ लोगों ने समझीं और पूछा”आप गुस्से में क्यों हैं” क्या इन पाठकों कोई महत्व नहीं है ।में भी अन्य हिन्दी कवियों की तरह अल्हड़ और मस्त हूँ अपने ब्लोग पर फोटो लगाने के मेरे पास साधन नहीं है और उन्होने मेरा मजाक बनाने की कोशिश की। मेरे पास कैमरा नहीं है तो में लिखना बंद कर दूं और इन ब्लोग से मुझे कुछ भी नहीं मिलता, कंप्यूटर का अधिक ज्ञान नहीं है, बस लिख रहा हूँ। मुझ जैसे ही लेखक इस देश में अधिक है। इसलिए ब्लोग पर लिखा गया विषय ही महत्वपूर्ण है और उससे भी अधिक लिखने वालों का प्यार। उनका यह नियम भी खारिज। मेरे एक क्षणिका देखिये
कुछ ब्लोगर पुराने नियम पर चलकर
घिसेंगे अपने महंगे जूतों के तलवे
नये लेखक अपना मौलिक लिखकर
नंगे पाँव ही बिखेरेंगे हिन्दी में जलवे
२४ अक्षरों की यह क्षणिका एक पोस्ट जैसी ताकत रखती हैं अगर समझ सको तो? मतलब हिन्दी ब्लोग पर कथ्य और तथ्य ही महत्वपूर्ण होते हैं। अभी बेनजीर की हत्या हुई थे और उस पर में एक पोस्ट डाली थी। अगर कोई ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य है तो उसमें शब्दों की संख्या नहीं देखी जाती। मूल बात है तथ्य है कथ्य और तथ्य। कोई समाचार देना हो क्या उसके साथ पहले संपादकीय थोडे ही लिखने बैठेंगे। अगर तुम्हारा नियम मान लें तो बस इनाम पाने के लिए ही लिखा जायेगा पाठकों के लिए नहीं। पिछले एक वर्ष से लिख रहा हूँ कुछ कवियों की रचनाएँ मेरी आंखों में पानी ला देतीं है। वह लिखते हैं और मुझे भावपूर्ण कविताओं पर कमेन्ट देते हैं। क्या मांगते हैं वह किसी से। उस पर अगर उनको आहत करना कि तुम्हारे ब्लोग मूल्यांकन से दूर रखेंगे। मुझे गुस्सा फिर भी नहीं आया क्योंकि में तो भाव के साथ बहता हूँ। जो मेरी भावुक रचनाएं देखते हो में उनके लिए लिखता हूँ इनाम के लिए नहीं। जब में कोई भावपूर्ण कविता लिखूं और उस पर मुझे चार-चार कमेन्ट मिले और बेहतर लेख लिखकर भी फ्लॉप हो जाऊं तो मुझे क्या करना चाहिऐ? शब्द प्रहार? एक कवि की तरह! वही मैं हास्य कविताओं में कर रहा हूँ,
कविता के ब्लोग अलग रखे। फिर रेटिंग दी। किसी भी पुराने ब्लोगर को यह हक़ नहीं बनता कि वह हिन्दी कवियों पर ऐसी टिप्पणी करे। हिन्दी लेखन में कोई वर्ग नहीं होता। तुम्हारे सब वर्गीकरण खारिज। हिन्दी में दो ही वर्ग हैं एक मौलिक लेखक दूसरा हैं अनुवाद लेखक। ब्लोगरों में जो अंग्रेजी से पढ़कर हिन्दी में ज्ञान प्रस्तुत कर रहे हैं वह अनुवाद भर है पर उनको अनुवाद की श्रेणी में नहीं हो सकते क्योंकि वह मौलिक लेखन भी करते हैं। अंग्रेजी में लिटरेचर की कोई श्रेणी नहीं दिखती पर हिन्दी में अभी नहीं तो कल साहित्य श्रेणी बनेगी। कोई तो कंप्यूटर का हिन्दी जानकार होगा जो लेखक होगा जो आयेगा। अभी तुम साहित्यकारों से एलर्जी दिखा लो पर अधिक समय चलने वाला नहीं है। अभी भारतीय टीम जीतें वाली है ज़रा उसे देख लें बाकी कल। (क्रमश
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