चलते-चलते अरसा हो गया-कविता साहित्य

चलते-चलते अपने शिखर बनाता गया
कभी खुद चढ़ने की चाहत नहीं रही
पर जहाँ कहीं पाँव रखा गड्ढे में भी
शिखर बनकर खडा हो गया
चलते-चलते अरसा हो गया

अपने ही शिखरों से नीचे आकर
चला जाता हूँ जहाँ भीड़ होती 
शिखर पर खडे बुत को देखने के लिए
मैं  भी कल्पना करता हूँ कि
कैसे मैं  नीचे दिखता होऊंगा
उन शिखरों  पर खडा होकर
फिर चला जाता हूँ
जहा शिखर होता है, मेरे लिए खडा होकर
मैं जाकर देखता हूँ
होती नहीं भीड़ मुझे देखने के लिए
ऐसा होते अरसा हो गया

भीड़ में भेड़ कभी नहीं मैं  बनता
शिखरों पर खडे लोगों के डर को
मैं जानता हूँ
क्योंकि वह मेरी तरह
इस शिखर से उस शिखर  तक का
रास्ता वह  नहीं तय कर सकते
उतरना जानते तो ही
किसी दूसरे शिखर पर चढ़ सकते
ऊंचाई पर खडे लोगों को
नीचे गिरने से डरते देख
आती हैं मुझे हंसी
जीवन की इस जंग में लड़ते हुए
गिरते-उठते मुझे बहुत अरसा हो गया
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One Response to “चलते-चलते अरसा हो गया-कविता साहित्य”

  1. bahut khub lajawab.

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