१.सारी प्रजा की रक्षा और उस पर शासन दंड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दंड ही जाग्रत रहता है. अत: बुद्धिमान लोग दंड को ही धर्म कहते हैं.
२.भली-भांति विचार कर दिए गए दंड से प्रजा प्रसन्न होती है, इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दंड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है.
३.यदि अपराधियों को सजा देने में राजा सदैव सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर को उसी प्रकार नाश कर देते हैं, जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है.
४.यदि राज्य अपराधियों को दंड नहीं देगा तो कौवा पुरोडाश खाने लगेगा, श्वान हवि खा जायेगा और कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा और समाज उत्तम स्थिति से मध्यम और उसके बाद अधम होकर व्यवस्थाहीन हो जायेगा.
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