कुछ देर आत्ममुग्ध हो जाएं, ब्लोग पर लिख आयें-हास्य कविता
आओ कुछ पल के लिए आत्ममुग्ध हो जाएं
चलो अपने ब्लोग पर लिख आयें
हमारे लिखने से ज़माना नहीं बदल जायेगा
पर दिल का गुबार तो निकल जायेगा
वैसे भी किसी के लिखे से
जमाना क्या बदलेगा
पहले तो हम ही बदल जाएं
कुछ लिखेंगे नहीं तो कुछ पढ़ने लगेंगे
किसने क्या लिखा उसके जाल में फंसेंगे
ढेर सारी किताबे लिखी गयी हैं
कुछ पडी हैं रद्दी की तरह अलमारी में
तो कुछ मशहूर हुईं हैं जंग करवाने के लिए
पूजने के लिए आलों में रखीं है
पर नहीं है वह भी पढ़ने के लिए
आओ अपना ही लिखा पढ़ते जाएं
वाद और नारों पर चलता रहा है समाज
नहीं उसके विचारों में गहराई आज
भेड़ की तरह हांके जाते लोग
जागते हुए खुली आंखों से नींद में
चलने का हो गया सबको रोग
आओ कुछ अपना ही लिखा पढ़ते जाएं
मन को बहना है इधर या उधर
जाना है वहीं ले जायेगा वह जिधर
कोई हमें पहले हांके कोई कथा सुनाकर
रच डालें कई कहानी और कवितायेँ
कोई हमें मन्त्र-मुग्ध कर
बाँध कर अपनी दरबार में सजाए
आओ कुछ पल के लिए आत्ममुग्ध हो जाएं
चलो अपने ब्लोग पर लिख आयें
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सही कहा आपने…कई बार अपने लिखे को ही फिर से पढने का मन करता है…
पढकर मंत्रमुग्ध होने का मन करता है।…
आश्चर्य भी होता है कई बार कि ‘यार!..ये सब मैँ कैसे लिख गया?’….