अंतर्जाल पर हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए समाज को भी आगे आना होगा-आलेख

एक खबर के अनुसार हिन्दी दुनिया की पांच बड़ी बोली जाने वाले भाषा है पर अंतर्जाल पर जो दस भाषाएं राज कर रही हैं उनमें हिन्दी शामिल नहीं है. अखबार में यह खबर पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. दरअसल जब हम किसी दूसरे देश या भाषा से अपनी तुलना करते हैं तो अपने कटु सत्यों को भुला देते हैं. अगर हम इस तुलना की बात करें तो आज से दस वर्ष बाद भी यही हालत रहने वाले हैं. अंतर्जाल पर हिन्दी के लिखे होने का बयान करने वाले प्रचार माध्यम भी हिन्दी के ही हैं. लिखा नहीं गया है और लिखा जाना चाहिऐ यह सन्देश तो सब दे रहे हैं पर जो लिख रहे हैं उनके लिए क्या प्रोत्साहन है इसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा है.

इतने सारे ब्लोग और इतने सारे विषयों पर लिखा गया है क्या किसी अखबार या पत्रिका ने आगे बढ़कर ब्लोग पर लिखी गयी सामग्री को अपने यहाँ प्रकाशित किया है? सामयिक विषयों पर इतने सारे लोग लिख रहे हैं पर क्या किसी प्रचार माध्यम ने इसका उल्लेख अपने प्रसारणों या प्रकाशनों में किया है? क्या किसी ने यह देखने या पढ़ने का प्रयास किया है की आखिर स्वतन्त्र रूप से लिख रहे ब्लोग देश में प्रतिष्ठित और प्रतिबद्ध संस्थानों से अलग क्या लिख रहे है? देश में प्रचलित विचारधाराओं से अलग हटकर केवल इन ब्लोगों पर ही लिखा जा रहा है क्या कभी इसे देखने का प्रयास किया गया है?
इन सवालों का एक ही जवाब है कि नहीं. एक हीरो के ब्लोग की चर्चा अखबारों ने की पर क्या देश के अन्य ब्लोगर भी बहुत कुछ लिख रहे हैं क्या किसी ने उसे पढ़ने का प्रयास किया? आखिर ब्लोगर किस्से प्रोत्साहित होकर लिखें. अपने हाथों को भारी तकलीफ देते हुए लिखें पर कौन इसे पढ़ रहा है?

मैं अपने सभी साथी ब्लोगरों का लोहा मानता हूँ जो तमाम सारी प्रतिकूल परिस्थितियों में वह सब कर रहे हैं जो किसी अन्य भाषा के लोग इतनी बड़ी संख्या में नहीं कर सकते. मैंने ब्लोग से संबधित बहुत सारी सामग्री दूसरे प्रचार माध्यमों में देखी है और उनमें वही जगह पा सकता है जिसकी वहाँ तक निजी पहुंच हो या उसका कोई साथी उस पर मेहरबान हो. निष्पक्ष अवलोकन कर कोई प्रस्तुति वहाँ नहीं हो पायी है. अंतर्जाल पर प्रभावी अन्य भाषाओं के-जिनकी पूरी जानकारी मेरे पास नही है-प्रभाव उनके समाज की आर्थिक और सामाजिक शक्ति के बिना नहीं बन सकता. समाचार पत्र–पत्रिकाओं का तो समझ में आ सकता है क्योंकि उनके पास वैचारिक रूप से काम करने वाले लोग होते हैं और संपादकीय और अन्य लेख लिख लेते हैं पर हिन्दी के टीवी चैनल और रेडियो तो यहाँ से सामग्री ले सकते है और कुछ समय इन ब्लोग पर लिखे विषयों को दें तो क्या बुराई है? अगर वह ऐसा करें तो देखिये कैसे लिखने वालों की संख्या बढ़ती है.

हालांकि ऐसा कोई करेगा नहीं क्योंकि अगर लोगों ने ब्लोग लिखना और पढ़ना शुरू किया तो शायद वह उनसे दूर हो जाएं-यह भय उन्हें ऐसा करने नहीं देगा. हिन्दी से कमाना तो सब चाहते हैं पर उसके लेखकों और ब्लोग लेखकों का खुश रहना कोई नहीं चाहता. ब्लोग लिखना एक रचनात्मक विधा है पर सब चाहते हैं कि हम अंतर्जाल पर एक उपभोक्ता की तरह ऐसे ही लिखे जैसे मोबाइल वाले एस.एम्-एस. करते हैं. ऐसी खबरें देकर लोग पता नहीं क्या सिद्ध करना चाहते हैं? मैंने इन ब्लोग पर कई ऐसी पोस्टें पढी हैं जो वाद और नारों पर चल रहे हमारे देश के प्रचार माध्यमों में नहीं मिल सकतीं, सबसे बडा सवाल लोगों को मालुम कैसे हो? अब यह तो संभव नहीं है कि पैसे खर्च कर किसी प्रचार माध्यम में विज्ञापन दें, ऐसे में जो लो इस तरह की खबरें दे रहे हैं उन्हें यह भी विचार करना चाहिऐ कि कैसे हिन्दी का अंतर्जाल पर प्रभाव उनके प्रयासों से कैसे बढ़ सकता है? ब्लोगरों की जिम्मेदारी है लिखना और वह लिख रहे हैं पर क्या समाज के प्रतिष्ठित और संपन्न वर्ग की इसके लिए कोई जिम्मेदारी नहीं है?

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