यह अंतर्जाल है कि इन्द्रजाल-आलेख
मैं तो इस अंतर्जाल को एक तरह का इंद्रजाल भी मानने लगा हूँ। अपनी पोस्टों का पीछा मैं कभी नहीं करता और एक बार लिखने के बाद मैं यह जानने का प्रयास नहीं करता कि वह लोगों को अच्छी लगीं या नहीं। पहले भी ऐसा ही था और अब भी वैसा ही हूँ। कभी-कभी लगता है की सादा हिन्दी फ़ॉन्ट में ना लिखने की वजह से मूल प्रकृति के अनुरूप नहीं लिख रहा पर यह समस्या भाषा शैली तक ही सीमित है। मुख्य रूप से विचारों में कोई अंतर नहीं है। हाँ, यूनिकोड में बड़ी रचनाएँ लिखने का अभ्यास नहीं है और व्यंग्य लिखने में कठिनाई होती है इसलिए हास्य कविताओं को माध्यम बनाया है। कुछ लोगों ने कटाक्ष किए और लिखते हैं कि ”आपकी गद्यनुमा कविताएँ बहुत अच्छी लगतीं हैं। मैं मुस्कराकर रह जाता हूँ। तीन चार बार बड़ी रचनाओं के रूप में व्यंग्य, कहानी और आलेख लिखे तो लोग कहते हैं की इतनी बड़ी मत लिखो। अब इसलिए छोटी पोस्ट में अपनी बात कहने के लिए इन्हीं गद्यनुमा कविताओं को हथियार बनाया है।
इन गद्यनुमा कविताओं से एक फायदा ज़रूर होगा कि इनकी चोरी इतनी आसान नहीं होगी। क्योंकि बहुत से लोग मेरी इस शैली के अभ्यस्त हो गये हैं और उनकी इतनी संख्या तो हो ही गयी है की कहीं अगर इनका चोरी से प्रकाशन हुआ तो वह मेरे किसी न किसी पाठक की नज़र में आएगी और लोग शायद इसकी सूचना मुझे देंगे। दूसरी एक और बात है कि अधिकतर चुराई गयी रचनाएं युवकों और युवतियों को आकर्षित करने वाली हैं ताकि वह उन्हें पढ़कर दूसरों को प्रभावित करने के लिए उपयोग कर सकें। अधिकतर लड़के ऐसी शायरी अपने लडकी दोस्तों को प्रभावित कर सकें। लडकियां गंभीर रचनाएं लड़कों के मुहँ से सुनकर बहुत प्रभावित होतीं हैं।चोरी करने वाले रचनाकारों के दिमाग में उन्हें प्रभावित करना ही है अत: कोई मेरी हास्य कविताओं का उपयोग नहीं करता।
यह तो एक बात कहने के लिए है। इस अंतर्जाल पर मैं कुछ प्रयोग कर रहा हूँ। पहले मैं इतने सारे ब्लॉग बनाकर पछता रहा था पर अब लगता है कि ऐसा नहीं करता तो शायद इतना मैं उनके चलते जो अनुभव हुआ है वह नहीं जान पाता।
आजकल मैं पाठकों के आने के रास्ते देख रहा हूँ। कई जगहें हैं यह देखने के लिए और कभी कभी तो लगता है की वह पाठकों/ पढे जाने वाले पृष्टों की कम ही जानकारी देतीं हैं। अगर उनकी संख्याएं ही सही मान ली जाए तो कुल संख्या ४०० के आसपास रहती है। लोगों की रुचियाँ देखकर आश्चर्य होता है। एक दिलचस्प बात यह है कि ब्लोगरों के रुचिकर विषयों पर लिखी पोस्टें चारों फोरम पर हिट्स दिलवातीं हैं पर पाठक उनको देखकर निराश होता है और जो पाठकों के लिए रुचिकर विषय हैं उनको फोरमों पर ब्लॉगरों के बीच हिट्स नहीं मिलते। मेरी शुरुआती दिनों में लिखी गयीं रचनाएँ जो नारद पर पाँच से अधिक हिट नहीं ले सकीं आज भी आम पाठको द्वारा पढ़ी जा रहीं है और उनकी संख्या प्रतिदिन पाँच से अधिक ही होती है। लोग कविताओं के नाम से नाक-भौं सिकोडते हैं पर वही सबसे पढ़ी जा रहीं हैं। मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि आध्यात्मिक विषय और हास्य कवितायेँ बहुत पढी जा रहीं हैं। कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि परस्पर विरोधी विषयों में मेरी खुद की कोई पहचान नहीं है क्योंकि मेरे मित्र मुझे गहन चिंतन और मनन वाले लेखों के लिए ही पसंद करते हैं। कई ऐसी पोस्टें जो चारों फोरमों पर दस हिट्स/व्युज नहीं दिलवा सकीं वह कई-कई दिनों तक बीस-बीस व्युज जुटा रहीं हैं। मतलब यह कि अब ब्लोगरों को आम पाठक को प्रभावित करने के लिए भी सोचना चाहिए।
इन सबसे बड़ी बात चाणक्य, कबीर, रहीम , मनु स्मृति, और कौटिल्य तथा अन्य आध्यात्म विषयों पर लिखीं गयीं रचनाएं तो हर दिन हर ब्लॉग पर पढ़ी जाती दिखती है, अगर कही सुबह से ही हिट्स या व्यूज हैं तो वह इन्हीं पर दिखते हैं। तब सोचता हूँ कि भारतीय आध्यात्म में कोई ऐसी शक्ति है जो उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती है। कई बार इन्हीं महापुरुषों के सन्देश के रूप में ऐसीं पोस्टें भी मेरे हाथ से निकल जाती हैं कि लोग खुश होकर लिख जाते हैं ”आप तो लिखते रहिए, आपका पढ़ने में मज़ा आता है।” अगर देखा जाये तो इनमें मैं अपनी बुद्धि का बिलकुल उपयोग नहीं करा और यह तो एक नक़ल भर है। इन पोस्टों को रखने के पीछे मेरा उद्देश्य ज्ञान बघारना नहीं बल्कि स्वाध्याय करना भी है। इनका परिणाम यह है की जब मैं लिखता हूँ तो वह मुझे भी कंठस्थ हो जाता है और बल्कि उनका उपयोग न केवल बाद में मौलिक रचनाओं में भी करता हूँ। कभी अपने मित्रों के बीच आम बातचीत में भी कई लोगों पर अपना ज्ञान झाड़ देता हूँ। मतलब मेरे दोनों हाथों में लड्डू होते हैः। स्वाध्याय का स्वाध्याय और नाम भी होता है और लोगों में अच्छी छबि भी बनती है। इसको देखकर यही भी सोचता हूँ कि आजकल के कई कथित संत इन्हीं महापुरुषों द्वारा भारतीय आध्यात्म के लिए बोये गये गए स्वर्णिम वृक्षों के फल अभी तक खाए जा रहे हैं।
नित नये अनुभवों से यही लगता है की अंतर्जाल पर लिखना पत्र-पत्रिकाओं में लिखे से अधिक बेहतर है। मुझे याद आ रहा है कि एक आलेख अख़बार और ब्लॉग पर साथ-साथ लिखा था। अख़बार में छपा लेख कोई अब पढ़ता होगा मुझे लगता नहीं पर वह लेख सतत यहाँ पढ़ा जा रहा है। मैं तो अब अपने संकलन की किताब भी छपवाने का कार्यक्रम भी बनाने का विचार छोड़ चुका हूँ, क्योंकि वह भी कहीं अलमारी में बंद हो जाएगा। यहाँ तो मेरा लिखा तब तक बना रहेगा जब तक अंतर्जाल और उसकी वेब साईटें हैं।
अब मेरे मन में आम हिन्दी पाठक के प्रति रुझान पैदा हो गया है और में अंतर्जाल पर नित प्रयोग के साथ उनके लिए वैसी ही रचनाएं लिखना जैसी में पहले चाहता था। आम पाठक को यह नहीं मालुम कि कमेन्ट लगाकर ब्लोगर का मनोबल बढाना है पर जो समझ गए हैं वह लिखते हैं। इन पाठकों के लिए वही सार्थक लिख पायेंगे जो त्वरित रूप से अपनी रचनाओं के प्रशंसा सुनने की आदत से मुक्त हो सकें। लगातार प्रयोग और उसके परिणामों से में इस निष्कर्ष पह पहुंचा हूँ कि जब तक आम पाठक हमारे लिखे से प्रभावित नहीं होगा तब तक वह इधर आकर्षित नहीं होगा। मैं इसे इन्द्रजाल इसलिए कहा कि शुरू में में आम पाठक के लिए लिखने आया था पर फिर विषय सीमित रह गए। हालांकि इस दौरान मैं कई रचनाएं ऐसीं लिखीं जो आम पाठक के लिए बहुत अच्छी थी पर लिखते समय मैंने इसका ख्याल नहीं किया। अब फिर मुझे आम पाठको को लक्ष्य कर लिखने का भाव पैदा हो रहा है और इसके लिए मुझे फोरमों पर हिट पाने का इरादा छोड़ना पड़ेगा। शेष बाद में।
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