शब्दों के भाव भी कम रंगीन नहीं होते-हास्य व्यंग्य
इसमें कोई संदेह नहीं है की पिछले कुछ दिनों से मेरे ब्लोगों के पाठक कम हो गए हैं और इसके दो कारण हैं एक तो अब इम्तहान का समय शुरू हो गए और इसमें छात्र, पालक और शिक्षक उसमें व्यस्त हो गए हैं और दूसरा मैं हास्य और गंभीर कवितायेँ नहीं लिख रहा हूँ। इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूँ क्योंकि मुझे तो लिखने से मतलब है। मैंने ब्लोग जगत में सब कुछ तो नहीं पर बहुत कुछ समझ लिया है। हिट और फ्लॉप दोनों का रूप समझ लिया है और अब मैं किसी प्रकार भ्रम में नहीं रहता क्योंकि वास्तविक धरातल पर चलने में जो शक्ति मिलती है उससे किसी भी सुझाव का परीक्षण करने का सामर्थ्य भी आ जाता है।
अभी चिट्ठाजगत ने गिरगिट का लिंक बांटने का काम शुरू किया है और उनके समर्थक ब्लोगर इस पर खूब पोस्ट लिख रहे हैं। जहाँ तक मेरा अनुमान हैं यह भोमियो का परिष्कृत संस्करण है। इन दोनों के बारे में पुराने ब्लोगर जानते हैं। इसे लगाने से अन्य भाषी लोग हिन्दी में लिखे को अपनी लिपि में पढ़ सकते हैं। चिट्ठाजगत के लोग निश्चित रूप से मेहनत करते हैं और मेरा उनको हतोत्साहित करने का कोई इरादा भी नहीं है हो सकता है आगे चलकर उनका कोई प्रयोग काम आये, पर जिस तरह ब्लोगर इस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं वह अतिउत्साह से प्रेरित हैं और मेरे लिए व्यंग्य का विषय।
मैंने एक वरिष्ठ ब्लोगर की पोस्ट देखी। चिट्ठा जगत के गिरगिट बांटो अभियान के समर्थन में लिखी पोस्ट पर उसे लिंक किया गया। मैंने वह पोस्ट देखी तो हंसी आयी गयी। हर वाक्य के पीछे प्रश्नवाचक चिन्ह था। उसका आशय कोई इस अभियान के समर्थन में नहीं लगता था पर खुलकर विरोध न करने के कारण पाठक भ्रमित हो सकता है। उसमें एक अन्य भाषा का ब्लोग दिखाया गया था। फिर पूछा गया की क्या आप इसे अपनी देवनागरी लिपि में पढ़ना चाहेंगे? आपका ब्लोग दूसरी लिपि में ऐसा दिखेगा और हो सकता है कि अन्य भाषा में कोई हिन्दी का कोई मुरीद आपको पढ़ना चाहे?
पूरे शब्द मुझे यादं नहीं रहे, पर उस ब्लोग पर कमेंट के रूप में केवल एक ही शब्द लिखने वाला था ‘नहीं’। इसके साथ ही पोस्ट पूरी हो जाती। मैंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि मुझे लगा कि पहले ही अपने साथ विवाद कम नहीं है और उसे किसलिए बढाएं। वह वैसे भी चिट्ठाजगत के सलाहकार रहे हैं।
इसलिए सोचा अलग से लिखेंगे। चिट्ठाजगत वाले बहुत मेहनत करते हैं और हिन्दी को अंतर्जाल पर फैलाने की उनकी प्रतिबद्धता को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर उनके प्रयोग हमेशा ही फलदायी नहीं रहते। पहले उन्होने रोमन लिपि का प्रयोग किया। फिर अपनी पसंद के ब्लोग की सुविधा जोड़ी जो ब्लोग पह पहले से ही उपलब्ध है। हाँ इसका फायदा मुझे जरूर हुआ। हम किसी की पसंद में नहीं है और जो अपनी पसंद के ब्लोगरों को पढ़ रहे हैं उन पर हम चाहे जो लिख लें कोई नहीं पढता। कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और हमने ब्लोगरों को इस समाज का हिस्सा मान लिया है इसलिए उन पर खूब लिखते हैं। अपनी पसंद पढ़ने वाले ब्लोगर हमारा ब्लोग देख भी नहीं पाते. हाँ इससे भी भी हमारी पाठक संख्या कम हुई है पर लिखने का मजा खूब आ रहा है। हमें पढ़ने वाले फ्री स्टाइल वाले हैं और वह चौपालों पर फ्री स्टाइल में ही पढ़ते हैं।
समस्या यह नहीं है कि हिन्दी भाषी लोग कंप्यूटर पर आते नहीं हैं बल्कि वह हिन्दी में पढ़ने में दिलचस्पी नहीं ले रहे या उनको पता नहीं है और यही चिंता का विषय है। हिन्दी में लिखने वाले ब्लोगर अपने आसपास देखें कितने लोगों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट है और जिनके पास नहीं हैं वह भी साइबर कैफे में जाते हैं। हिन्दी उत्तर भाषा की आधार स्तंभ है और यहाँ क्या कम इंटरनेट हैं। लोग अगर हिन्दी नहीं पढ़ रहे तो कोई अंग्रेजी भी नहीं पढ़ रहे। वह तो अपनी आँखें फोटो देखने में बर्बाद कर रहे हैं। इंटरनेट का सदुपयोग करने वालों की संख्या कम है इसलिए ही हिन्दी लिखने वालों को पाठक कम मिल रहे हैं। मेरे ब्लोग के पते ले गए पर उनमें से कितने खोल रहे हैं यह मुझे पता है? घर पर बच्चों की खातिर इंटरनेट लगवाने वाले निजी लोग कंप्यूटर पर क्या देखना चाहते हैं? फिल्मी हीरोइनों के नाम लिखकर सर्च करते हैं। वह हिन्दी बोल लिख सकते हैं क्योंकि इसके अलावा कोई और भाषा उनके लिए है ही नहीं अंग्रेजी से पैदल जो हैं। हिन्दी में पढ़ने के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं क्योंकि खुद हिन्दी में कोई साहित्य लिखना उनकी बूते का नहीं है।
ऐसे में अपनी लिपि को गिरगिट की तरह बदलने के सुविधा कोई बडा पाठक वर्ग जुटाएगी यह सोचना भी गलती है। यह सवाल तो तब उठता जब हमें लगता कि हिन्दी देवनागरी के जानकार लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा कम है।मैं अपने जान-पहचान वालों को हिन्दी टूल की जानकारी भेजता हूँ। अपने मित्रों को अपने पते देता हूँ और उनसे कहता हूँ कि मेरा पढ़ना नहीं चाहते तो चौपालों के लोगो क्लिक कर उन पर जाओ। उन पर अन्य लिंकित ब्लोग पढो। चौपालों पर कोई ब्लोग प्रिय लगे तो उसका नाम मुझे बताओं में उसे लिंक कर दूंगा। मेरे अपने होने के बावजूद तुम अगर नहीं पढता चाहते तो तुम्हें दूसरे ब्लोग डेस्कटॉप पर सेव करके दे जाऊंगा।कोई सार्थक परिणाम नहीं मिलता।
फिर भी मैं आशावादी हूँ क्योंकि अपने प्रयोगों से बहुत कुछ सीख रहा हूँ। लिखने में कोताही नहीं बरतता क्योंकि मुझे पता है कि मेरे लिखे शब्दों को पढ़ने वाले कम नहीं होंगे। मेरा लक्ष्य हिन्दी के आम पाठक तक पहुंचना है और उसके लिए जो भी सात्विक उपाय हैं करूंगा और मुझे सफलता मिलेगी। मुझे गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलना क्योंकि शब्दों के भाव भी कम रंगीन नहीं होते। इसके बावजूद चिट्ठाजगत के लोगों की मेहनत का प्रशंसक हूँ. खुद अपना पसीना बहाता हूँ इसलिए किसी की मेहनत का मजाक नहीं उडाता।
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