कविता का जन्म ही पीडा से होता है-आलेख

हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद ही मुझे लगने लगा था कि ब्लोगरों पर भी व्यंग्य लिखना चाहिए पर लगा कि इतने सारे ब्लोगर हैं और कोई नाराज हो गया तो? इसलिए कुछ दिन खामोश रहा पर एक हैं क्योंकि मुझे लगा कि इससे मेरी शांति में खलल पडेगा. धीरे-धीरे मैंने अपने ऊपर ही ब्लोगर के रूप में व्यंग्य लिखना शुरू किया. मैंने व्यंग्य लिखना एक हास्य कविता से शुरू किया था जो एक ब्लोग से प्रेरित होकर लिखी थी. एक ब्लोग है आईना ब्लोग. उन्होने मेरी एक पोस्ट के शीर्षक को दूसरे ब्लोग की पोस्ट के शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया था. उन्होने ऐसा अन्य ब्लोगरों की पोस्ट के साथ भी किया था और यह बताया था कि किस तरह दो ब्लोग की पोस्ट के शीर्षक विरोधाभासी हैं. उसमें मेरा सीधे मजाक उडाया नहीं गया था पर तब मैंने पहली हास्य कविता अपने ब्लोग पर लिखी थी ”आईने में बदहवास दीपक बापू”. उसके बाद तो मैंने एक के बाद एक हास्य कवितायेँ लिखीं. इसका मतलब सीधा है कि आईना ने मुझे हास्य कवितायेँ लिखने के लिए प्रेरित किया.

आज उसमें धुरविरोधी के लिए एक हास्य कविता थी और मुझे बहुत दिलचस्प लगी. धुरविरोधी एक प्रख्यात ब्लोगर रह चुके हैं और अब वह ब्लोगवाणी(हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखाने वाला फोरम)के संचालक हैं-मुझसे मिलने वाले एकमात्र ब्लोगर श्रीसुरेश चिपलूनकर ने यही बताया था. तब मुझे लगा कि हो सकता है कि वह अनुमान के आधार पर कह रहे हैं. आज इस बात की पुष्टि हो गयी. अगर मैं ब्लोगवाणी के संचालक को भुलाकर केवल धुरविरोधी की बात करूं तो मुझे उनकी याद है. ब्लोग जगत में सबसे अधिक सक्रिय ब्लोगर के रूप में रहे उस शख्स की कोई पोस्ट मैं इससे पढता वह ब्लोग बंद कर लापता हो गया. हुआ यह कि उस समय मैं समझ नहीं पा रहा था कि यहाँ क्या हो रहा है? उसके जाने के बाद मैंने उसे दिलचस्प व्यक्ति को उसकी कमेन्ट की माध्यम से जानने का प्रयास किया.मैंने वह सब पोस्टें देखीं जिस पर उनकी कमेन्ट थी. उसकी विदाई पर कई ब्लोगरों ने विदाई का ऐसा ग़मगीन माहौल बनाया कि अगर कभी हिन्दी ब्लोग जगत पर फिल्म बने और ऐसा दृश्य हो तो लोग रो पड़ेंगे.

लोगों की याददाश्त कमजोर होती है पर लेखक की नहीं. मेरे अन्दर उस समय धुर विरोधी के लिए ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. मैंने उसकी कमेन्ट देखकर महसूस किया कि यह शख्स कभी भी यहाँ से छोड़ कर नहीं जायेगा. बिलकुल मेरी तरह नशेड़ी है लिखने का. धुरविरोधी के छद्म नाम है यह तो कोई भी कह सकता है इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि वह कहीं असली नाम से प्रगट होगा. वैसे धुरविरोधी ने हमेशा अपनी कमेन्ट में मेरी प्रशंसा की पर जिस मुद्दे पर वह विवाद कर रहे थे उसमें मैं उनसे असहमत था. सबसे बड़ी बात यह कि मैंने उस शख्स की कोई पोस्ट देखी नहीं थी और देखी तो याद नहीं थी पर इतना तय था कि धुरविरोधी की हिन्दी ब्लोग लेखन में प्रतिबद्धता निर्विवाद थी.
प्रसंगवश याद आया कि मेरे एक अन्य मित्र अरुण ‘पंगेबाज’ ने भी बहुत शोर मचाया था-हम उसे नहीं जानते पर शायद मुम्बई में रहते हैं आदि-आदि. पंगेबाज और धुरविरोधी के अगर तेवर देखें तो ऐसा लगता है कि लडाकू होंगे पर अगर उनका लेखन की गहराई देखें तो ताज्जुब इस बात का होता है ब्लोग जगत के लोग उनको समझ नहीं पाए. हास्य का भाव स्वाभाविक रूप से पैदा करने की उनमें शक्ति है. अगर किसी ने मुझे गलत जानकारी नहीं दी हो तो अरुण जी भी ब्लोगवाणी से कहीं न कहीं जुडे हुए हैं. लिखने का मजा किस तरह उठाया जाता है यह इनसे सीखना चाहिऐ. अरुण पंगेबाज से मेरी दोस्ती अधिक नहीं है पर एक दो बार संपर्क से यह लग गया है कि वह भी मजे लेने वाले आदमी हैं.
हाँ, एक बात जरूर हैं कि हिन्दी में फोरम चलाना आसान नहीं है और ऐसा लगता है कि दोनों अब लिख कम ही पाते हैं. धुरविरोधी यानी ब्लोगवाणी के मैथिली जी आज उस आईने के निशाने पर हास्य कविता के रूप में आ गए जिसे मैंने कभी निशाने पर लिया था. सच तो यह कि मैं कविता पढ़कर हंस पडा.

मगर असली बात यह नहीं है जो मैं कह रहा हूँ.उस कविता में आईना के लेखक की पीडा यह है कि उनका ब्लोग ब्लोग वाणी से अलग कर दिया गया है और वह कई ईमेल मैथिली जी को भेज चुके हैं पर वह लिंक नहीं हो रहा है. मगर यह सब उनके साथ नहीं हो रहा है. मेरे कई ब्लोग ऐसे हैं जिनके लिए मुझे ब्लोग वाणी को कई ईमेल करने पड़े. बाद में वह लिंक हो जाते हैं. अब यह तो समय की उपलब्धता का भी सवाल है कि लोगों को अपने अन्य काम भी रहते हैं और हिन्दी ब्लोग जगत से अभी कोई विशेष आय होती हैं नहीं. मगर जिस तरह आईना में कविता लिखी गयी है उसे देखकर तो यही लगता है कि कविता वास्तव में पीडा से पैदा होती है. इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्द अगर दुनिया से ख़त्म हो जायेगा तो कविता ही नहीं पैदा होगी.

हिन्दी ब्लोगर कई बार ऐसे सनसनी और रोमांच पैदा कर देते हैं कि लगता है कि अब पता नहीं क्या होगा. कहीं हमला होता दिखाएँगे तो ऐसा कि आदमी घबडा जाये कि पता नहीं क्या हुआ? पहले लहू लहान होने की खबर सारा दिन चलायेंगे फिर शाम को घोषणा कि चिंता की कोई बात नहीं है. मैं एक बात यकीन से कह सकता हूँ कि जब फिल्म वालों को कोई कहानी न नहीं मिलेगी तब वह ब्लोगरों पर कहानी ढूंढेंगे तो कई वर्षों तक उनको कहानियों का टोटा नहीं पड़ेगा. बहरहाल किसी विवाद में पड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं और आज ऐसे ही खाली-पीली बैठा था तो सोचा कि अपने दोनों तरफ के मित्रों में जो द्वंद चल रहा है उस पर विचार करूं. फिर धुर विरोधी जिसने मुझे प्रेरित किया था और आईना जिसकी वजह से मुझे हास्य कविता लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई उन पर कुछ न कुछ तो लिखना ही था.

One Response to “कविता का जन्म ही पीडा से होता है-आलेख”

  1. वाह बहुत खूब । लिखा करो । अच्‍छा लगता है ।

    कृष्‍णशंकर सोनाने

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