शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता

कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है
लिखने बैठे बचपन से
अपने गुजारे लम्हों की कहानी
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी
भूल गए रोना क्या होता है
देखा है बस एक ही सच
काटता है वही आदमी जो उसने बोया होता है

कहैं दीपक बापू
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता
पर इसके लिए कोई काबिल भी तो नजर आता
जो बेचते हैं सम्मान
उनको लिखना नहीं आता
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता
ऐसा लगता है कि
पहले सम्मान की सोचते हैं
बाद में लिखा होता है
हम तो अपने लिखे को कभी
सम्मान के योग्य नहीं पाते
तो सम्मान कहाँ से जुटाते
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता
होता समय नष्ट
फिर हम दूसरों का लिखा कहाँ पढ़ पाते
और बिना पढे भला क्या लिख पाते
जो पढ़ते बिलकुल नहीं लिखते हैं जरूर
उनमें आ जाता है गुरुर
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते
अपनी कमअक्ली का पता था
इसलिए लिखना किया शुरू
शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है
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