अंतर्जाल पर उन्मुक्त जी का छुट-पुट विचरण-समीक्षा

क्या आप उन्मुक्त जी को जानते हैं? मैं भी नहीं जानता होता अगर वह इतने उन्मुक्त नहीं होते. अक्सर हम ब्लोग पर तकनीकी श्रेणी की बात करते हैं तो उसके बारे में मेरा मत है कि जो हिन्दी ब्लोग एक स्थान पर दिखाने वाले जो फोरम हैं उसमें काम करने वाले वास्तव में तकनीकी विशेषज्ञ है क्योंकि उसमें खुद उनकी बुद्धि भी लगती है. अगर उनसे अलग कोई ब्लोर्गों में कोई तकनीकी विशेषज्ञ मुझे दिखाई देता है तो वह हैं श्री उन्मुक्त जी.

उन्मुक्त जी को पिछले ११ महीन से देख रहा हूँ और इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंतर्जाल पर हिन्दी को दृढ़ता पूर्वक स्थापित करने के लिए उनकी प्रतिबद्धता साफ दिखाई देती है. मैं वर्डप्रेस पर सादा हिन्दी फॉण्ट में लिख रहा था पर किसी भी पढ़ने वाले को समझ में नहीं आ रहा था और मैं इससे बहुत परेशान था. आखिर ब्लागस्पाट के हिन्दी टूल पर पता नहीं कैसे काम करना आ गया तो वहाँ से ही शीर्षक और कुछ लाईनें लिखकर बाकी पूरी पोस्ट सादा हिन्दी फॉण्ट में रख दी. हिन्दी में लिखे को अंतर्जाल पर उन्मुक्त भाव से विचरण करते हुए उन्मुक्त जी की दृष्टि उस पर पड़ गयी. उन्होने लिखा आपकी पोस्ट ”कूडा” दिखाई दे रही है.(इस पर वह खेद जता चुके हैं और अगर यह पोस्ट उनकी नजर से गुजरे तो अब फिर दोबारा दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह घटना दिलचस्प है इसलिए उसका दुबारा उल्लेख कर रहा हूँ) तब मैं शहर के एक साईबर कैफे में गया और वह मुझे पूरी पोस्ट साफ दिखाई दे रही थी. तब मुझे पता चला कि जिनके पास हिन्दी फॉण्ट नहीं है वह उसे पढ़ नहीं सकते. मैंने तब तो ब्लोग स्पॉट में घुसकर उनकी शक्ल बदल दी थी. वहाँ में देव और कृति देव के फॉण्ट सेट कर दिए थे और वहाँ लिखता जा रहा था पर सब पर उन्मुक्त जी एक साथ उखड़े हुए थे. उन्मुक्त जी की कमेन्ट ने मुझे चिढा दिया और इधर नारद से भी मैं खुंदक खा गया था तो उनकी बात को अनसुना कर दिया. सदा फॉण्ट में ही ईमेल किया और वह उनके समझ में नहीं आना था क्योंकि तब अपने ही एक ईमेल से दूसरे ईमेल पर भी करके देखा तो मेरे समझ में भी नहीं आया.

एक बार मैंने एक नया ब्लोग बनाया और उसमें एक ब्लोगर के संबंध में लिखा गया था और मैंने उसे उस पर टाईप किया ताकि वह ब्लोगर पढ़ सके और फिर उसे अपने किसी पंजीकृत ब्लोग पर रख सकूं. उस ब्लोगर का स्वीकृत सन्देश मुझे सुबह मिला तब मैं अपने उस ब्लोग को खोलने दूसरे ईमेल पर गया तो वहाँ उन्मुक्त जी की कमेन्ट रखी थी. मुझे बहुत हैरानी हुई तब मैंने उसमें कुछ और भी जोडा ताकि लोग यह न कहें कि पुरानी पोस्ट थोप दी. मगर उस दिन से उन्मुक्त जी से सतर्क हो गया और उनके ब्लोग की पोस्ट से यह तो समझ में आ गया था कि वह सॉफ्ट वेयर इंजीनियर हैं. उस दिन से मैं अपना जो भी नया ब्लोग बनाता हूँ तो यह मान लेता हूँ कि यह उन्मुक्त जी की नजर में चढ़ जायेगा. अगर किसी ब्लोग को उनसे बचाना है तो उसे केवल ब्लोग लेखक के लिए का ताला लगा देता हूँ और मुझे शक है कि वह शायद ही उनको रोक पाता होगा. अगर मैंने किसी को ताला नहीं लगाया तो इसका मतलब है कि उनका वहाँ पहुंचना मुझे स्वीकार्य है.

हिन्दी में उनके पास अपना एक फोरम है जहाँ मेरे सब ब्लोग दिखते हैं और उनको देखते हैं केवल उन्मुक्त जी. हिन्दी में चार नहीं पांच फोरम हैं और एक उन्मुक्त जी का निजी है.जब मैं उनके बारे में कल्पना करता हूँ तो ऐसा लगता है कि कोई दूरबीन है जहाँ से वह देखते हैं और फिर रख जाते हैं. उन्मुक्त अपने नाम की तरह उन्मुक्त होने के साथ निर्लिप्त भाव से काम करने वाले आदमी हैं. एक बात जो उनमें सबसे अच्छी है कि वह लिखने में अपनी पोस्ट को रुचिकर बनाने का कोई प्रयास नहीं छोड़ते. हर हिन्दी ब्लोगर को प्रोत्साहित करने में उनका कहीं न कहीं हाथ है. अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने के लिए उन्होने मुझे प्रेरित नहीं किया पर उनकी वजह से ही मैंने इसे चुनौती के रूप में लिया. जब उन्होने कहा था आपकी पोस्ट कूडा दिख रही है तो वह नहीं जानते होंगे कि कंप्यूटर पर मैंने १९८५ से १९८६ तक काम किया और तब मुझे विंडो नहीं मिलता था और मैंने उनसे मिली चुनौती की वजह से यूनीकोड में लिखा और सच तो यह है कि नारद पर भी उनको ललकारने के इरादे से आया था पर उन्होने पहली पोस्ट पर ही मैत्रीपूर्ण कमेन्ट लिखकर मुझे हंसा दिया था. धीरे-धीरे लगने लगा कि वह न केवल साफ्ट इंजीनियर हैं बल्कि मस्तमौला और खुशदिल व्यक्तित्व के स्वामी हैं. मैंने उनको नहीं देखा पर उनका लिखा देखकर यही राय बनती है-मेरा यह भी मानना हैं लिखते में अधिक देर तक आदमी ढोंग नहीं कर पाता और अगर आप किसी को बहुत समय तक पढें तो उसके बारे में स्थाई राय कायम कर सकते हैं. उन्मुक्त जी को बहुत पढ़ने पर मेरी यही राय बनती है.
हिन्दी में नये ब्लोगरों को खोजकर उनको फोरमों में लाने का काम उन्होने बखूबी निभाया और आज जो हिन्दी ब्लोगर एक जगह पर दिख रहे हैं उनमें उनकी भूमिका भी कम नहीं है. हिन्दी को अंतर्जाल पर स्थापित करने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं वह उल्लेखनीय है. इसके अलावा हिन्दी के ब्लोगर कुछ नयी चीजें सीखें और उनको आर्थिक लाभ हो ऐसी उनकी तीव्रतर इच्छा है. मुझे उनकी पोस्टों और कमेंटों में कई बार भोलेपन का स्वाभाविक रूप से अहसास होता है और तब मैं हंसता हूँ. नयी जानकारियाँ देना, यात्रा विवरण लिखना और अन्य सूचनाएं देना उनकी पोस्टों का हिस्सा है पर सबसे महत्वपूर्ण है सदाशयता जो अपने पाठको और मित्रों के साथ दिखाते हैं वह अनुकरणीय है. मैं हमेशा कहता हूँ कि अच्छा ब्लोगर वह है जो खुद भी लिखे और दूसरे को भी लिखने के लिए प्रोत्साहित करे. इसमें वह खरे उतरते हैं. मैं अपनी यह कमी मानता हूँ कि चाहे भले ही लिखता हूँ पर किसी को प्रोत्साहित नहीं कर पाता इसलिए जो खुद लिखकर दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं उनका मेरे मन में सम्मान है.

हर समीक्षा के बाद मैं जैसा कि लिखता हूँ कि उन्मुक्त जी के बारे में अगर कम या गलत लिख गया हूँ तो उनके समर्थकों और प्रशंसकों से और अधिक लिख गया हूँ तो उनके आलोचकों से क्षमा चाहूंगा. इस पोस्ट को लिखते समय मेरे मन में उनके प्रति के स्वाभाविक मैत्रीभाव है इसलिए लिख रहा हूँ और जो भी लिखा है वह केवल यह बताने के लिए कि उन्मुक्त जी की भूमिका मेरे लिए कितनी महत्वपूर्ण है. मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ.
उनके ब्लोग हैं
छुट-पुट

2 Comments

  1. Posted March 26, 2008 at 05:29 | Permalink

    दीपक जी, आप मेरे बारे में अच्छे विचार रखते हैं, मेरी पहली टिप्पणी का बुरा नहीं माना – यह आपका बड़प्पन है।

    चुनौती के ही कारण सही पर अब तो आप हिन्दी चिट्टाजगत में छा गये।

    आपने मेरे बारे में दो प्यारे शब्द लिखे इसका धन्यवाद।

    मैं सॉफ्टवेयर इनजीनियर नहीं हूं, मैं तो फइलों को इधर उधर पलटता हूं :-)

  2. Posted March 26, 2008 at 10:11 | Permalink

    अधिकतर हिन्दी के नये ब्लाग्स पर शुरूआती टिप्पणी श्री उन्मुक्त जी की ही होती है. इनका काम वाकई सराहनीय है.
    आपको ये पोस्ट लिखने के लिये धन्यवाद.


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