मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल पर लिखना शुरू कर रहा हूं। रोमन लिपि में लिखकर हिंदी लिखता तो कहीं न कही मन में अस्वभाविकता का अनुभव तो होता ही था-एसा लगता था कि हकलाते और तुतलाते हुए ही लिख रहा हूं। मैने नारद पर अपनी जो पहली पोस्ट लिखी थी उसका शीर्षक ही था ‘मैं हकलाते हुए लिख रहा हूं’। उसके बाद भी बहुत लिखा पर हमेशा कहीं न कहीं यह लगता कि अपना मौलिक स्वरूप जब खुद ही नहीं दिख पा रहा हूं तो दूसरे क्या देख पाते होंगे।
कृतिदेव में कल से यह मेरी छठी पोस्ट है। कल कृतिदेव का हिंदी टूल जब अपने डेस्कटाप पर ला रहा था तो शंका थी कि वह सफल होगा क्यांकि पहले भी ऐसे ही दो टूलों पर मैं अपना समय खराब कर चुका था-हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि वह टूल गलत थे। हो सकता है कि मुझे उपयोग करना ही नहीं आता हो। संभवत: मेरा कंप्यूटर उसे स्वीकार नहीं करता हो। ऐसे टूल रहे होंगे इसमें तो मुझे यकीन था क्योंकि अंतर्जाल की दो पत्रिकाओं हिन्दी नेस्ट और अभिव्यक्ति-अनुभूति ने मेरी देव और कृतिदेव फोट में भेजी गयी रचनाओं को संभवतः इन्हीं टूलों से यूनिकोड में बदल कर प्रकाशित किया गया होंगा। इसके बावजूद मैं एक वर्ष तक इन टूलों से दूर रहा तो इसका कारण यही हो सकता है कि यह टूल पूरी तरह सौ प्रतिशत उपयोगी नहीं रहे होंगे या इनका स्थानांतरण कठिन होगा। ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैने कुछ साथी ब्लागरों को यह लिखते हुए देखा कि हमें तो कृतिदेव में ही काम करना पसंद करते है।’ इधर यह भी स्वीकार करते थे कि वह यूनिकोड में लिख रहे है।
मैं इन चर्चाओं पर नजर रखता था। एक बार तो मैने लिख भी दिया था कि ऐसा कोई प्रमाणिक टूल आयेगा तो वह गूगल से ही आयेगा। कल जब मैने एक ब्लाग देखा और उसमें इस टूल को अपने डेस्कटाप पर लाया। जब इसमें मैने अपनी कृतिदेव में टंकित सामग्री यूनिकोड में रखी और क्लिक किया तो जो सामने परिणाम आया उसे मन खुश हो गया। यूनिकोड का उपयोग के इस्तेमाल की बात करें तो कह सकते हैं कि कुछ नहीं से तो जो है वहीं ठीक है। अपनी अभिव्यक्ति करने के लिये रोमन लिपि का हिंदी टूल का उपयोग किया पर कृतिदेव का परिवर्तित टूल का कल से इतना उपयोग कर लिया है कि अब उसमें सीमित दिलचस्पी रह गयी। वह भी कभी कमेंट लगाने या शीर्षक के लिये काम में लेंगे।
यह टूल बहंत पहले नहीं मिला इसको लेकर मन में कोई निराशा भी नहीं है। वजह यह है कि यूनिकोड में बहुंत कठिनाई से लिखते थे पर वह संघर्ष कई एसी हास्य कविताओं का जन्मदाता बना जिसके न होने पर संभव नहीं होता। कई बार अच्छा और मजेदार ख्याल आया तो उस पर बड़ा व्यंग्य लिखने की बजाय छोटी हास्य कविताएं लिख दीं और वह पंसद की गयीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि महापुरूषों के संदेश सुबह लिखने का मन बनाया क्यांकि अपने निजी जीवन और लेखन में उनके संदेशों पर आधुनिक संदर्भ में व्याख्या को कई लोगों ने बहुत पसंद किया। जब शूरूआत की तो कम समय होने के कारण हमने सीधे संदेश ही लिखे ताकि मन को तसल्ली रहे कि हम यहां भी वही कर रहे है। पिछले पंद्रह दिन से अपनी टंकण की अपनी गति को बढ़ा हुआ देखा तो वर्तमान संदर्भ में व्याख्या देने का काम शूरू किया तब तक यह टूल आ गया। यह टूल आफलाइन भी काम कर रहा है इसलिए इंटरनेट को खोलकर बैठने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा कोई शब्द गलत दिख जाये तो उसे बीच में ठीक किया जा सकता है जबकि दूसरे टूलों पर यह त्रटियां ठीक करने में कठिनाई आती थी।
कई बार जब व्यंग्य या कहानी लिखने का मन आता तो पहले तो यह सोचना पड़ता था कि वह कितना लंबा खिंचेगा। जब लगता कि वह लंबा खिंचेगा तो फिर मन नहीं होता था। कृतिदेव में इस चिंता से मुक्त रहेंगे। एक बैठक में नहीं तो अगली बैठक में उसे पूरा कर सकते है-क्योंकि उसको तो अपने वर्ड प्रोग्राम में ही तो रखना है।
कुल मिलाकर अभी तक हकलाते और तुतलाते लिख रहे थे पर अब लगता है कि वह बंद हो गया है। सबसे बड़ी बात यह कि इसमें हमारी आंखें नहीं थकेंगी क्योंकि इसमें हमें कंप्यूटर की तरह देखने की जरूरत ही नहीं है। अगर कोई कागज या किताब सामने रखकर लिखते जायेगे जबकि यूनिकोड में सामने भी देखना पड़ता है कि अक्षर सही आया कि नहीं। कृतिदेव में तो हम आंखें ही बंद कर टाइप कर लेते है। एक बार टाइप करने के बाद उसे फिर देखते हैं और कोई सुधार होता है तो कर देते है।
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