देखते-देखते बीत गया एक साल-आलेख
मैने आज अपने ब्लाग देखे। 4 अप्रैल 2007 को मेरा ब्लाग नारद पर आया था जबकि अपने ब्लागों पर फरवरी 2007 से ही लिखना शुरू कर चुका था। अपने मुख्य ब्लागों-दीपक भारतदीप का चिंतन और दीपक बापू कहिन पर मैने 4 अप्रैल को ही यूनिकोड में लिखना शूरू किया था। इससे पहले इन पर देव और कृतिदेव में पोस्ट रखी थीं और शीर्षक यूनिकोड में रखे थे। आज मैने एक लेख वहां से उठाने का प्रयास किया ‘क्रिकेट में सब चलता है यार’, तो उसमें 1713 शब्द थे। कृतिदेव में लिखरा गया यह आलेख मैने परिवर्तित टूल में ले जाकर उसे यूनिकोड में बदला और फिर उसे वहीं रख दिया। इतना बड़ा लेख दोबारा पोस्ट करने का साहस नहीं कर सका।
मैने अपनी छोटी कविताएं दूसरे ब्लाग पर मार्च में ही रखी थी पर नारद पर न होने की वजह से अन्य ब्लागर उसे नहीं पढ़ पाये पर लोग उनको आज भी पढ़ते है।
पूरा एक वर्ष हो गया ब्लाग जगत पर आधिकारिक रूप से लिखते हुए। मेरा सबसे पहला लेख था कि ‘हकलाते हुए लिख रहा हूं’। यह इसलिये लिखा था क्योंकि मुझे अपने हिंदी में कार्य करने के अभ्यास के विपरीत अंगे्रजी टाईप का सहारा लेना पड़ रहा था। आज एक वर्ष बाद मैं अपना यह आलेख कृतिदेव में टाईप कर रहा हूं यह अलग बात है कि इसे परिवर्तित टूल से यूनिकोड में कर पोस्ट करूंगा।
पिछले एक वर्ष का लेखाजोखा प्रस्तुत करने का कोई लाभ नहीं है पर फिर भी इस दौर में मैने बहुत कुछ देखा और अनुभव किया। कई बार मैने यूनिकोड में लिखना छोड़कर सीधे अपनी पोस्ट कृतिदेव में लिखने का मन भी बनाया यह सोचकर कि जिसके पास हिंदी फोंट होगा तो अपने आप पढ़ेगा पर इस बात से कभी आश्वस्त नहीं था कि कुछ लोग भी इसे पढ़ पायेंगे। जब अभी श्रीअनुनाद सिंह ने देव और कृतिदेव फोंट को यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल बताया तो मुझे बहुत खुशी हुई पर जब इसमें दोबारा काम शुरू किया तो लगा कि मैं जिस तेजी से अपना दिमाग यूनिकोड में चला रहा था उतना अब नहीं चला रहा हूं क्योंकि उसमें मुझे अंग्रेजी की बोर्ड के हिसाब से सक्रिय रहना पड़ता था और उससे विचार भी तेजी से आते थे। कृतिदेव में टाईप करते हुए आराम से सोचता हूं और इसका प्रभाव मेरे तीव्र लेखन पर विपरीत पड्ता लग रहा है। मुझे यह टूल तब मिला जब मुझे इसकी जरूरत नहीं थी पर मेरे लिये इस टूल को अपनाने का अलावा कोई रास्ता नहीं था।
एक बात जो अब हुई वह यह कि अब मेरे पास बुरे और अतार्किक लेखन का कोई बहाना नहीं रहा हैं। मेरे मित्र मुझे यही कह रहे थे। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा‘‘तुम अब कृतिदेव वे टाईप कर रहे हो यह बात हमें तुम्हारी पोस्टों से पता लग गयी है। अब हमारे सामने यह बहाने नहीं करना कि क्या करूं यूनिकोड में लिखता हूं। पहले तो तुम पर तरस आता था इसलिये बिना मतलब की कविताएं झेल जाते थे पर अब तुम वैसा ही लिखना जिसकी वजह से हम तुम्हें एक लेखक माने न कि ब्लागर’
मैने कहा-‘पर तुम भी अपना हाजमा ठीक कर लो। हमेशा कहते हो कि छोटा लिखो पढ़ते हुए कंप्यूटर पर आंखें थक जातीं हैं। जब दोबारा फार्म में आऊंगा वहां कृतिदेव में व्यंग्य लिखूंगा तो वह सत्रह-अठारह शब्दों से कम क्या होगा। पढ़ पाओगे?’’
वह मित्र बोला-‘‘नहीं यार, ऐसा गजब मत करना। भले ही देर से फार्म में आना पर अपने व्यंग्य और कहानी छोटे रूप में ही लिखना।’’
पिछले एक वर्ष पर शायद लिखने के अलावा मेरे पास अधिक नहीं है। इस लेख को पढ़ने वाले तो यही कहेंगे कि हम तो जैसे पहले पढ़ रहे थे वैसे ही अब भी पढ़ रहे हैं पर मेरे लिये वैसा लिखना नहीं है जैसा पहले लिखता था। मेरे यह लेख वैसे ही लिखा जा रहा है जैसे मैं एक वर्ष पहले लिख रहा था पर अब आप परिवर्तित टूल से इसे यूनिकोड में पढ़ रहे हैं और मैं इसे कृतिदेव में सहजतापूर्वक टाईप कर रहा हूं।
जब आया तो केवल फोरम था नारद। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने के लिये तीन फोरम और हैं-ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लाग्स। मेरे मित्रों की जो संख्या है उससे मै संतुष्ट हूं। मुझे किसी से कोई गिला नहीं है। मैने जो भी लिखा स्वविवेक से लिखा और ब्लागरों पर कुछ लिखा तो इसलिये क्योंकि इसे समाज में स्थापित एक नया वर्ग या जाति मानता हूं। यह मेरे स्वभाव में ही है कि मैं अपने देश के पुराने अध्यात्मिक स्वरूप को बहुत मानता हूं पर जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम बने समूहों को एक भ्रम मानता हूं। किसी भी ब्लाग पर जाता हूं तो ऐसा लगता है कि अपने स्वजातीय बंधु का लिखा पढ़ने आया हूं। यूनिकोड में असहज परिस्थतियों में भी सहजता से पूरी ताकत से लिखा पर कृतिदेव में लिखते हुए मुझे ताकत का उपयोग नहीं करना पड़ता। सच कहूं तो मुझे ब्लाग जगत से निकाल दिया क्योंकि यूनिकोड में सीधे न लिखकर मैं ऐसा ही अनुभव करता हूं।
आखरी बात ब्लागरों ने कृतिदेव से हटाकर यूनिकोड में लिखकर एक तरह से मेरे लेखक को बेहोश कर दिया पर अब कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल देकर उसे फिर होश में लाये। हिंदी में लिखने की प्रतिबद्धता तो बचपन से ही मेरे मन में आ गयी थी और इसी कारण मैं सभी हिंदी में लिखने वालों का सम्मान करता हूं। लिखना कोई आसान काम नहीं है जो भी लिख रहे हैं वह एक असाधारण काम कर रहे हैं।
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