‘मेरा परिचय’ में क्या रखा है-आलेख
आज वर्डप्रेस के नवीनीकृत डेशबोर्ड पर दिख रही अपनी टाप पोस्टों को अवलोकन इस दृष्टि से कर रहा था कि देखें आखिर पाठकों का क्या रुझान है। इसमे एक ब्लाग पर मेरा परिचय दूसरे नंबर पर चमक रहा था। चूंकि उसमें केवल शूरू की तीन पोस्टों के व्यूज ही बताता है इसलिये अन्य पर मेरा परिचय को कितनी बार क्लिक किया गया होगा यह पता नहीं पर वह बाकी चार ब्लाग पर शूरू के तीन नंबरों में नहीं है
जब मैं शुरू मे अपने ब्लाग बना रहा था तब मैने अपना परिचय बिना किसी विचार के रख दिया। अगर मुझे सबसे अधिक कठिन कोई बात लगती है तो वह अपना परिचय लिखना। फिर यूनिकोड में सीधे लिखना तो पहाड़ जैसा। अब तो शूरू में हिंदी टाइप के फोंट कृतिदेव में लिखने में बहुत सहुलियत हो रही है पर फिर भी दोबारा परिचय लिखना तो कठिन लगता है। अब सोचा है कि किसी दिन फुरसत में बैठकर आत्ममुग्ध होकर लिखेंगे। उसमें अपनी खूब डींगें हांकेंगे। अब कोई ब्लागर तो हमारा परिचय पढ़ेंगे नहीं जो कोई आक्षेप ढूंढ पायेंगे।
मुझे सबसे अधिक इस बात का आश्चर्य है कि आखिर मेरा परिचय लोग क्योंे पढ़ते हैं? अभी तक जो मेरी सीधी यूनिकोड में लिखी गयी रचनाओं में ढेर सारी गल्तियां हैं और क्या यह देखने के लिये लोग पढ़ते हैं कि आखिर इतनी गल्तियां करने वाला कौन है? अपनी रचनाओं को लेकर मेरे अंदर कोई खुशफहमी नहीं है। हो सकता है कि बेसिर-पैर की रचनाएं देखकर सोचते हों कि हो कोई आसपास का तो उसे डांट आयें कि क्या लिखता है, समझ में नहीं आता। वगैरह…………….वगैरह।
लिखने को लेकर मेरे मन में कभी आत्ममुग्धता का भाव नहीं रहा तो यह भी कि मैने कभी कुंठा भी नहीं पाली। जैसा मैं पढ़ना चाहता हूं वैसा ही लिखता हूं। कलम मेरे लिये एक मित्र की तरह रही है और मै जानता हूं कि वह मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाने वाली है। मगर यह परिचय…………………….जितना दिया है उतना ही ठीक है। इसमें जोड़ने के लिये अब मेरे पास कुछ नहीं है। जैसा लिखता हूं वैसा हूं भी। बचपन से ही लेखक बन जाने के कारण अंतर्मुखी तो हूं पर भीड़ में भी घबड़ाता नहीं हूं क्योंकि लिखने की सामग्र्री तो वहीं से मिलती है। भीड़ में एक आदमी के रूप में ही जाना मुझे पसंद है। सामने मंच पर बुत हों और नीचे बैठे बुत उन्हें देख रहे हो यह भी देखता हूं-दोनों में ही कुछ कहानियां और विचार ढूंढता हूं। न आम हूं न खास हूं बस एक लेखक हूं। कुछ चिंतन और कुछ मनन चलता रहता है। उसका जिक्र किसी से नहीं करता पर अगर कहीं वार्तालाप चलता है और उसमें जब बोलता हूं तो लोग प्रभावित होते हैं और लिखे की तारीफ तो खैर बहुत होती है। अपने लिखे से लाभ की भावना कभी नहीं रही क्योंकि एक रचना करने के बाद मैं दूसरी के पीछे लग जाता हूं तो पहली वाली का फायदा उठाने की फुरसत ही कहां रहती है? हजारों रचनाएं छपी हुई पड़ी है पर अब उनमें मुझे कोई सार नजर नहीं आता।
पहले कवि सम्मेलनों में जाता था पर तब भी श्रोताओं के बीच में जाकर बैठ जाता था। गोष्ठियों में गया तो बस एक-दो कविता सुनाई या फिर सुनकर ही संतोष कर लिया। आकाशवाणी पर एक बार व्यंग्य और कविताएं पढ़कर आया और उसके बाद फिर अपने रोजगार में लग गया। दूसरों का लिखा पढ़ता हूं पर उनके परिचय में भी मेरी दिलचस्पी नहीं रहती। एक मजेदार बात यह है कि मेरे घनिष्ठ लेखक मित्रों के घर कभी नहीं गया और न मेरे पास आये-इसका कारण यह भी हो सकता है कि शहर छोटा होने के कारण हमारी मुलाकातें कुछ निश्चित स्थानों पर हो जातीं है। । इनमें से ही एक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया जो इधर ब्लाग जगत में ले आया। यहां भी ढेर सारे मित्र बन गये हैं। वक्त आने पर उनके मिलूंगा।
मैं क्या लिखता हूं इस पर बात करता हूं। मेरे क्या विचार हैं यह भी सुनाता हूं। अगर किसी का काम पड़ जाये तो वह करने में खुशी होती है। मैं कहां रहता हूं, क्या करता हूं? उनमें भी छिपाने लायक कुछ नहीं है पर कोई पूछता है तो मैं असहज होता हूं। जरूरत समझता हूं तो बता देता हूं पर कोई पूछता है तो टालने की करता हूं। तब सोचता हूं कि क्या मेरा लिखे शब्द कुछ नहीं बतातंे? क्या वह निरर्थक है? एक लेखक की सबसे बड़ा परिचय तो उसके शब्द होते हैं जिनके साथ वह जी रहा होता है। वह उसके अंतर्मन को खोल देते हैं। फिर उसके बारे में क्या जानना? आदमी हजारों नाटक करता है और लेखक को भी अपने देह पालन के लिये वह सब करना पड़ता है पर वह अपने लिखे के प्रति प्रतिबद्ध अपनी आत्मा के साथ होता है तो?
आप सवाल करेंगे कि क्या ऐसे लेखक भी है जो अपनी आत्मा से प्रतिबद्ध नहीं होते? मैं किसी पर आक्षेप नहीं करता पर यह जरूर कहता हूं कि कई लोग ऐसी कोशिश करते हैं और जीवन भर करते ही रहते हैं पर हालत उनको ऐसा नहीं करने देते। मैं इसलिये प्रतिबद्ध रह पाया हूं कि मेरे शब्द ही इस जीवन में मेरे सच्चे मित्र रहे हैं और अगर मै उनसे वफादारी नहीं निभाता तो चलता कैसै? शेष फिर कभी
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