पसीना ही कविता लिखवाता है

बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ
ग्रीष्म के जलती दोपहर में
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है
नरक लगता हो जीवन
शाम होते बहती ठंडी हवा का
एक झौंका भी शीतल कर देता है
मौसम और मन के पहिये
घूमते देख कौन कह सकता है
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ
……………………..

गर्मी की दोपहर में
साइकिल पर चलते हुए
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है
लिखता है कविता वह हसंते हुए
कभी उसे रोते नहीं देखा है
पूछने पर बताता है
उसके दोपहर का पसीना ही
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं
क्योंकि वह चेहरा
केवल उसी में नजर आता है

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