पसीना ही कविता लिखवाता है
बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ
ग्रीष्म के जलती दोपहर में
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है
नरक लगता हो जीवन
शाम होते बहती ठंडी हवा का
एक झौंका भी शीतल कर देता है
मौसम और मन के पहिये
घूमते देख कौन कह सकता है
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ
……………………..
गर्मी की दोपहर में
साइकिल पर चलते हुए
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है
लिखता है कविता वह हसंते हुए
कभी उसे रोते नहीं देखा है
पूछने पर बताता है
उसके दोपहर का पसीना ही
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं
क्योंकि वह चेहरा
केवल उसी में नजर आता है
Filed under: Deepak bharatdeep, E-patrika, Friends, bharat, blogging, bloging, education, hindi bharat, hindi patrika, hindi poem, hindi sahity, hindi shayri, inglish, internet, mastram, media, online jurnalism, shayri, urdu, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, web navbharat, web nayi duniya, web panjab kesari, web times, अभिव्यक्ति, कला, कविता, चरित्र, दीपक भारतदीप, दृश्य, मस्तराम, व्यंग्य कविता, शायरी, शेर-ओ-शायरी, समाज, हास्य-व्यंग्य, हिन्दी पत्रिका