यह तो है हिंदी का अंतर्जाल युग -आलेख
हिंदी की विकास यात्रा का चार खंडों में बांटा जाता है और इसमें हमारे यहां सबसे अधिक भक्ति काल महत्वपूर्ण रहा है। आजकल आधुनिक काल के दौर से हिंदी गुजर रही है। मैं सोचता हूं कि अंतर्जाल पर लिखी जा रही हिंदी को आखिर किस स्वरूप में देखा जाय। हिंदी की अंतर्जाल यात्रा को अभी तक कोई अधिक समय नहीं हुआ है और देखा जाय तो इस पर पुरानी पुस्तकों से उठाकर भी बहुत लिखा जा रहा है। आधुनिक काल के अनेक लेखकों के नाम यहां बार-बार आते हैं उनकी रचनाओं की चर्चा भी यहां पढ़ने को मिलती है। अगर पुराने आध्यात्म ग्रंथों और स्वर्णकाल (भक्ति काल) की उल्लिखित रचनाओं का छोड़ दिया जाये तो आधुनिक काल के रचनाकारों की रचनायें यहां अधिक लोकप्रिय नहीं हो पा रहीं हैं-मुझे ऐसा आभास हो रहा है।
स्वर्णकाल या भक्ति काल की रचनायें अधिकतर काव्यात्मक हैं और उनके रचनाकारों मीरा, तुलसी, सूर, कबीर और रहीम आदि कवियों ने अपनी रचनाओं में बहुत संक्षिप्त में जीवन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करने के साथ भक्ति और ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उन्होंने गागर में सागर भरा जो कि अंतर्जाल पर लिखकर लोकप्रियता प्राप्त करने की प्रथम शर्त है। आधुनिक काल में भी ऐसी रचनाएं होती रहीं हैं पर वह उनकी चर्चा बहुत कम होती हैं। यहां बड़े उपन्यास और कहानियों को पढ़ना कठिन है। हां, आगे चलकर जब इस पर घर में प्रिंट निकालना सस्ता होगा तभी ऐसी संभावना बनती है कि बड़ी रचनाओं को लोकप्रियता मिलने लगे। अभी तो कंप्यूटर के साथ जो प्रिंटर मिल रहा है उसकी स्याही बहुत महंगी है और इस कारण उस पर प्रिंट निकालना महंगा है।
मैं मानता हूं कि अंतर्जाल पर हिंदी के स्वरूप के समझने के लिए इसे हिंदी का अंतर्जाल युग भी कह सकते हैं और जो लोग लिख रहे हैं उनको इस बात को समझना चाहिए कि वह हिंदी का एक युग अपने कंधे पर लेकर चल रहे हैं। मैं अनेक नये लेखकों को पढ़ता हूं तो लगता है कि उनमें नवीन शैली से लिखने का अभ्यास अब अच्छा होता जा रहा है। आधुनिक काल तक हिंदी कागज पर चली थी पर अंतर्जाल पर कागज का स्वरूप फोटो के रूप में है। यहां गागर में सागर भरने की शर्त वैसी है जैसे स्वर्ण काल के रचनाकारों ने निभाई। अपनी कहानियों के साथ प्रकृति या दृश्यव्य वस्तुओं का वर्णन पढ़ने से पाठकों में उकताहट आ सकती है। बहुत संक्षिप्त और सीधें बात कहने से भाषा का सौंदर्य ढूंढने वालों को भी निराशा का अनुभव हो सकता है। ऐसे में संक्षिप्त रूप के साथ भाषा का सौंदर्य जो रचनाकार अपने पाठ में देंगे वह यहां पर बहुत लोकप्रिय होंगे।
अक्सर लोग एक दूसरे पर फब्तियां कसते हैं-‘अरे, कविता लिखते हो तो क्या तुलसी या सूर हो जाओगे, या ‘कहानी लिखते हो तो क्या अमुक विख्यात लेखक जैसे हो जाओगे’। मेरा मानना है कि तुलसी,मीरा,सूर,रहीम और कबीर जैसा संत बनना तो एक अलग विषय है पर यहां कई कहानीकारों के लिए हिंदी मे लिखते हुए ‘अंतर्जाल के कहानीकार, व्यंग्यकार और कवि’ के रूप में प्रसिद्ध होने की संभावनाएं बहुत है।
हिंदी के आधुनिक काल के रचनाकारों की एक लंबी फेहस्ति बहुत लंबी है। आधुनिक काल के लेखकों और कवियों ने हिंदी के विकास के लिये तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को दृष्टिगत बहुत सारी रचनाएं लिखीं पर उनमे बदलाव के कारण उनका पढ़ना कम होता गया है। स्वर्णकाल के कवियों ने मानव के मूल स्वभाव के दृष्टिगत अपनी बात लिखी जिसमें बदलाव कभी नहीं आता पर परिस्थितियों को घ्यान में रखकर लिखीं गयी आधुनिक काल की रचनाएं इसलिये पुरानी होने के कारण लोकप्रिय नहीं रह पातीं और धीरे-धीरे नयी परिस्थितियों में लिखने वाले लेखकों रचनाऐं लोगों के मस्तिष्क मेंे स्थान बनाती जातीं हैं।
अनेक लेखक अब भी अपनी किताबें छपवाने के लिए लालायित रहते हैं। मेरा अंतर्जाल पर पर्दापण ही मेरे एक ऐसे मित्र लेखक के कारण हुआ जिसने अपनी किताब छपवाई थी और वह मुझसे अंतर्जाल की एक पत्रिका का पता मांग रहा था। मैंने इंटरनेट लगवाया इसलिये था कि इससे देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं त्वरित गति से भेज सकूंगा। जब उस मित्र ने मुझे उस पत्रिका का पता ढूंढने के लिये कहा तो मैं हिंदी शब्द डालकर उसे ढूंढ रहा था पर वह नहीं मिली। आज वही शब्द डालता हूं तो बहुत कुछ आ जाता है। धीरे-धीरे मैंने अपने ब्लाग को ही पत्रिका मानकर इस पर लिखना शुरू किया।
मुझे लगता है कि लोगों में हिंदी में अच्छा पढ़ने की बहुत ललक है पर अभी पाठक और लेखक के बीच के संबंध व्यापक आधार पर स्थापित नहीं हो पा रहे पर यह आगे जरूर बनेंगे। हालांकि इसमें सबसे सबसे बड़ा सवाल पहचान का है कि जिसने हमकों लिखा है वह असली नाम से है या छद्म वाला। मैरे पास कई टिप्पणी आती हैं और उससे यह समझना कठिन लगता है कि आम पाठक की है या किसी मित्र ब्लाग लेखक की-हालांकि मुझे लगता है कि आगे चलकर पाठक भी अपनी टिप्पणियों लिखेंगे और वह अपने पंसदीदा लेखकों के बारे में विचार व्यक्त करेंगे। वजह हिंदी में पढ़ने वाले लोग यह जानते हैं कि अच्छा लिखने वालों की इस देश में कमी नहीं है पर पत्र-पत्रिकाओं में उनके सामने वही लेखक आते हैं जो लिखने के अलावा छपवाने में भी माहिर होते हैं। इसमें छिपा हुआ कुछ नहीं है। अधिकतर कालम लिखने वालों के परिचय में उनका लेखक के रूप मेंे कम दूसरा प्रसिद्ध परिचय अधिक छपा रहता है। फिल्म, साहित्य, कला, चित्रकला, संगीत, पत्रकारिता और आकर्षक व्यवसायों में वही पुराने लोग हैं या उनकी संतानें अब अपना काम कर रहीं हैं। लोग नया चाहते हैं और उनको पता है कि यह स्वतंत्र रूप से केवल अंतर्जाल पर ही संभव है।
कुछ लोग पुराने साहित्यकारों के नामों के सहारे यहां अपना प्रचार कर रहे हैं पर उनको अधिक सफलता नहीं मिलने वाली। पाठक लोग नया चाहते हैं और पुरानी रचना और रचनाकार जिनको वह जानते हैं अब यहां पढ़ना नहीं चाहते। मैं ब्लाग जगत पर निरंतर सजगता से देखता हूं। मै ढूंढता हूं कि मौलिक लेखक कौन है? हां, अब यह देखकर खुशी हो रही है कि मौलिक लेखक अब यहां खूब लिख रहे है।
मेरी मौलिक लेखकों को सलाह है कि वह पीछे न देखें। चलते चले जायें। अगर कोई उनसे कहता है कि तुम क्या अमुक लेखक जैसे बड़े बन सकते हो? तो उसका जवाब न दो क्योंकि तुम उससे भी बडे बन सकते हो। तुम्हारी रचनाऐं तो अनंतकाल तक यहां रहने वाली हैं जबकि पुराने रचनाकारों की रचनाऐं और किताबें अल्मारी में बंद पड़ी रहती हैं जब तक कोई उसे न खोले पढ़ी नहीं जातीं। जबकि अंतर्जाल लेखकों की रचनाएं तो चाहे जहां पहुंच सकतीं हैं और बिना किसी मेहनत के कोई इसका अनुवाद कर भी पढ़ सकता है। हिंदी के अंतर्जाल युग में वही लेखक अपना मुकाम लोगों के हृदय में बनायेंगे तो मौलिक रूप से लिखेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कई लेखक तो इसलिए नाम कमा सके कि येनकेन प्रकरेण उन्होंने संपर्क बनाकर शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में अपनी रचनाएं छपवायीं। अंतर्जाल तो एक खुला मैदान है जहां कोई किसी के आगे लाचार या मजबूर नहीं है। इसलिये मैं मानता हूं कि हिंदी के अंतर्जाल युग का सूत्रपात हो चुका है। आधुनिक काल के कई समर्थक इसका विरोध कर सकते हैं पर उसका जवाब भी मैं कभी दूंगा हालांकि उस पर विवाद खड़ा होगा और वैसे भी सब तरफ फ्लाप होते ब्लाग को देखते हुए यह समय ठीक नहीं है।
Filed under: Deepak bharatdeep, E-patrika, Friends, alekh, education, hindi bharat, hindi patrika, hindi sahity, inglish, internet, life, mastram, media, online jurnalism, urdu, vews, vishwas, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, web navbharat, web nayi duniya, web panjab kesari, web times, अभिव्यक्ति, कबीर, कला, दीपक भारतदीप, नज़रिया, मस्तराम, मातृभाषा, व्यंग्य, संपादकीय, समाज, सूचना, हास्य-व्यंग्य, हिन्दी पत्रिका