साहित्य कुंजःअंतर्जाल पर हिंदी की श्रेष्ठ साहित्यक पत्रिका-समीक्षा
इस समय अंतर्जाल पर जो हिंदी भाषा की पत्रिकाएं निकल रहीं है उसमें मुझे साहित्य कुंज बहुत प्रभावित करती है। इसके संपादक श्री सुमन घई इसका स्वयं ही संपादन कर जिस तरह प्रस्तुत कर रहे हैं वह सराहनीय है।
बिना किसी प्रचार के अपना काम करने की उनकी प्रवृत्ति ने मुझे प्रभावित किया है। पत्रिका देखने के बाद यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि उसमें सामग्री में पाठकों से व्यापक वर्ग का ध्यान रखा जाता है।
आमतौर से लोग संपादन के कौशल को महत्व नहीं देते और उनको लगता है कि कुछ रचनाएं या समाचार आ गये और उनको प्रस्तुत कर दोए जो समझ में न आये उसे उठाकर कूड़ेदान में फैंक दो.यह बात नहीं हैं। हालांकि आजकल अनेक जगह संपादक ऐसी ही प्रवृत्ति के है। मैं स्वयं संपादक रह चुका हूं और मुझे पता है कि एक संपादक के रूप में आप अपने दायित्व का निर्वाह उचित ढंग से नहीं करते तो आपको हर जगह आलोचना का शिकार होना पड़ता है। आजकल भारत के अधिकतर पत्र और पत्रिकाएं इसलिये भी लोगों की दृष्टि में सम्मान खाते जा रहे हैं क्योंकि संपादन कला को पेशेवर दृष्टि से अपनाने वाले बहुत हैं पर उसकी कला को समझने वाले कम है। कई जगह तो संपादक अपने लेखन से ही लोगों का स्वयं बताते हैं कि हम संपादक हैं वरना उनकी पत्र और पत्रिकाओं की सामग्री लोगों में इस बात की दिलचस्पी नही उत्पन्न करती कि वह जानना चाहे कि ‘इसका संपादक कौन है.’
हिंदी में अंतर्जाल हो या बाहर.दोनों जगह पत्रिकाओं की बाढ़ आयी हुई है। जिस तरह फिल्मों में किसी हीरो को काम मिलना बंद हो जाता है तो वह निर्माता बनकर अपनी फिल्में बनाने लगता है। यही हल पत्र पत्रिकाओं के संपादकों का है। जिसे कहीं छपने का अवसर नहीं मिलता या उनको लगता है कि अब वह अधिक नहीं लिख सकते वही आदमी संपादक बनने का प्रयास करता है। संपादक बन जाने के दो फायदे हैं.एक तो नहीं भी लिखा तो नाम पत्रिका पर आ ही जाता है और आज भी लेखक को कम संपादक को लोग अधिक मानते हैं इसलिये लोग इस तरफ अधिक आकर्षित नहीं होते। कई लोग तो जो थोड़ा बहुत लिखना जानते हैं और उनको लगता है कि उनका लिख लोकप्रियता या तो बहुत जल्दी नहीं दिला सकता या फिर कभी नहीं दिला सकता वही संपादक बन जाते हैं और फिर कहीं सम्मान तो कही पुरस्कार लेकर उसका आनंद उठाते हैं। आप अगर अपने आसपास हिंदी के सम्मान और पुरस्कार कार्यक्रमों के स्वरूप को शायद ही कभी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित होते देखेंगे कि जो लेखन के अलावा उससे संबंधित क्रिया से संबंध न रखता हो या जिसने पैसा खर्च कर अपनी किताब न छपवाई हो।
अंतर्जाल पर कई ऐसी पत्रिकायें हैं पर श्री सुमन घई की की साहित्य कुंज मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है। वह जिस तरह कहानियां, हास्य व्यंग्य, कविताएं, शायरी, पुस्तक चर्चा बाल साहित्य, लोक साहित्य और ई पुस्तकालय जैसे स्तंभ प्रस्तुत कर रहे है वह बहुत प्रभावित करते है। मेरे विचार से कोई भी अन्य अंतर्जाल पत्रिका इतनी सारी सामग्री और कुशलता से प्रस्तुत नहीं कर पा रही है।
उनकी पत्रिका देखकर यही कहा जा सकता है कि उनसे अंतर्जाल पर संपादकीय कौशल सीखा जाना चाहिए। मैं उनका हर हर अंक पढ़ता हूं। चूंकि मैं भी अपने ब्लाग/पत्रिका लिखता हूं और अपने पाठकों को यह पत्रिका पढ़ने को मिले इसलिये उसे आज लिंक प्रदान कर रहा हूं। मैं चाहता हूं कि लोग इसको पढ़ें। इतनी अधिक सामग्री इस पर है कि लोग उसे पढ़ना चाहेंगे। मेरी रचनाएं इस पर प्रकाशित होती रहतीं हैं पर यह महत्वपूर्ण नहीं बल्कि लोग इस पत्रिका को पढ़कर अंतर्जाल पर हिंदी पढ़ने को उत्सुक हो यही मेरा प्रयास है। श्री सुमन घई को मेरी शुभकामनाएं हैं और विश्वास है कि वह अंतर्जाल पर हिंदी को स्थापित करने के लिये ऐसे ही संपादकीय कौशल का परिचय देते रहेंगे।
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सुमन घई जी कार्य अत्यन्त सराहनीय है. कई बार साहित्य कुंज पर मेरी प्रकाशित हुई है. सुमन जी को इस अनुकरणीय कार्य के बधाई और आपका आभार.