कविता लिखना बहुत सहज है और कोई भी लिख सकता है पर वह पाठक के हृदय में उतर जाये वही कविता उसकी भाषा का साहित्य बन जाती है। जहां कवि में यह भावना आयी कि वह अपने लिखे से समाज में बदलाव लायेगा वहां न केवल अपनी रचनाधर्मिता को खो बैठता है वहीं कुछ समय बाद अपनी रचनाओं से ही निराश होने लगता है। मूलतः मैं भावुक हूं और मुझे कवि होना चाहिए पर मैंने अपनी पहली रचनाएं गद्य के रूप में ही लिखी। यही कारण है कि मेरी कविताओं के गद्य होने का बोध भी होता है। मैं अपने लिखने पर स्वयं खुश होता हूं पर अगर कोई उसे पढ़ता है तो और भी खुशी होती है।

मेरी अनेक संपादकों से मित्रता है और जब मैं उनको अपनी कविता प्रकाशन के लिए देता हूं तो नाकभौं सिकोड़ लेते हैं और अगर उसे ही मैं खड़े ही गद्य कर दूं तो वह उसे छाप लेते हैं। कुछ लंबी कवितायें मैंने जानबूझकर लिखकर एक संपादक को दीं तो वह बिना देखे ही उनको नकारते हुए कहने लगे-‘अरे यार, कोई गद्य रचना हो तो दो। मैंने उससे दो कागा मांगे और बातें करते हुए ही उसी कविता को गद्य में बदल दिया। वह छप गयी और उसकी तारीफ भी हुई। मेरे एक मित्र ने उसकी तारीफ की और कहा कि‘इसी तरह ही व्यंग्य लिखा करो। कविताओं में इतना मजा नहीं आता।’
कुछ लोगों को कविता से एलर्जी है और कहीं छपी कविता को देखकर उससे मूंह फेर लेते हैं। उसके पास दिख रहा चुटकुला पढ़ लेंगे पर वह कविता नहीं पढ़ेंगे। हां, इस आदत के बारे में कई लोग मेरे सामने स्वीकार कर चुके हैं।

कविता लिखने की एक विधा है और उसकी विषय सामग्री ही महत्वपूर्ण होती है उसका स्वरूप नहीं। मुख्य बात यह है कि सृजनकर्ता अपने पाठ में किस विषय को किन शब्दों और भावों को प्रवाहित कर रहा है यह अधिक महत्वपूर्ण है। अगर आज कवियों को सम्मान कम मिल रहा है (कुछ व्यवसायिक हास्य कवियों या विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े कवियों की बाद छोड़ दें) तो इसका कारण यह है कि आजकल पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होना कोई आसान काम नहीं है और बहुत कम लोग होते हैं जिनको स्थान मिल पाता है। ऐसे में कवियों के लिऐ अपने पाठों को रचना के अलावा उनको पाठकों तक पहुंचाने का मार्ग भी प्रशस्त करना कठिन हो जाता है। जिन्होंने एक सीमित दायरे में मुझे पढ़ा है वह अक्सर मुझ कहते हैं कि‘तुम अपनी रचनाएं बड़े अखबारों में क्यों नहीं भेजते।‘
मैं आखिर वहां अपनी रचनाएं कैसे भेजू। पहले उनको परिश्रम से टाइप करूं फिर डाक के पैसे खर्च कर उनको भिजवाऊं और प्रतीक्षा करता रहूं कि कब प्रकाशित हो रहीं हैं। मेरी यह प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं हुई। राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर रचनाएं छपीं पर उसने कोई आय नहीं हुई। एजेंसियों के माध्यम से कई जगह मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई और लोग उनके बारे में कोई अपनी राय स्पष्ट रूप से नहीं देते थे जबकि गद्य पर उनकी बाछें खिल जातीं थीं। राष्ट्रीय स्तर पर छपी रचनाओं की अनेक कटिंग आईं, पर फिर भी मैं भीड़ में ही खोया रहा। कविताएं अगर छपीं तो वह स्थानीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में ही छपीं।
वास्तविक लेखक को अपने विषयों पर चिंतन और मनन के अलावा अन्य कुछ नहीं आता ऐसे में बाजार का प्रबंधन करना उसके लिए कठिन है। ऐसी स्थिति में भाग्य कहें यह कौशल कुछ कवियों की रचनाएं इन पत्र-पत्रिकाओं मेेंं छप जातीं हैं और उनके विषय शायद लोगों का पसंद नहीं होते यही कारण है कवियों के प्रति लोगों के मन में निराशावादी रवैया घर कर गया है।
फिर पीड़ा से ही कविता का जन्म होता है और इस देश में पीड़ा बहुत है इसलिये कवि भी बहुत है। यह कवि उस पीड़ा को अपने शब्दों में प्रशंसा की आशा में व्यक्त करते हैं और चंद लोग उनको दिखाने के लिये दाद देते है तो उनको यह भ्रम हो जाता है। जबकि वास्वविकता यह है कि आम लोग ऐसी कविताएं पढ़ना चाहते हैं जिसमें कोई संदेश होने के साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ता हो या उसको हंसने का अवसर मिलता हो। यही कारण है कि साहित्यक दृष्टि से नहीं लिखी गयी हास्य कवितायें भी लोगों में वाहवाही लूटती हैं। देखा जाये तो हास्य कविताएं अपने आप में कविताएं होती ही नहीं है। यह मैं कह रहा हूं जो तीन सौ से अधिक हास्य कवितायें अपने ब्लाग पर लिख चुका हूं। मेरे निजी मित्र जो कि मेरे द्वारा कवितायें लिखने पर नाकभौं सिकोड़ते हैं वह भी कहते हैं कि मजा आ गया पर यार उसको हम कविता नहीं मानेंगे।’
वह प्रतिदिन मुझसे व्यंग्य की अपेक्षा करते हैं यह संभव नहीं है। वैसे मैं अगर बेहतर व्यंग्य लिखना चाहूं तो उसके लिये मुझे पहले हाथ से लिखना पड़ेगा और फिर उसे यहां टाईप किया जा सकता है। फिलहाल यह संभव नहीं है क्योंकि यहां से किसी भी प्रकार की आय या सहयोग की कोई फिलहाल आशा नहीं है। पाठक संख्या की वृद्धि की गति धीमी है। फिर अभी कोई विज्ञापन वगैरह नहीं है। इसके बावजूद यहां हर तरह के पाठक हैं। हास्य कविताओं ने जहां लोकप्रियता दिलाई वहीं गंभीर चिंतन (अपने निजी मित्रों में केवल इसलिये ही मुझे लेखक माना जाता है) ने तो कई ऐसे लोगों के हृदय में बिठा दिया है कि आप अगर उनके सामने मेरे नाम लेंगे तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ जायेगी-यह मेरी आत्मप्रवंचना नहीं है मेरे निजी मित्र यही राय रखते हैं। प्रसंगवश मैं सोच रहा हूं कि अपने रजिस्टर में दज दीपक बापू कहिन में राजेंद्र अवस्थी का वह चिंतन यहां लिखूं जिसने मुझे इस चिंतन की तरफ मोड़ा। हालांकि मैं चिंतन पहले भी लिखता था पर उनकी रचना पढ़ने के बाद मेरे अंंदर चिंतन लिखने का आत्मविश्वास आया उस पर स्चयं भी आश्चर्यचकित होकर देखता हूं और लिखता हूं। उस समय इतना डूब जाता हूं कि लगता है कि जो लिख रहा है वह कोई और है। यही कारण है कि हमेशा सभी ब्लाग लेखकों को ललकार कहता हूं कि अगर पढ़ोगे नहीं तो तुम क्या तुम्हारे फरिश्ते भी मौलिक लेखन नहीं कर सकते। राजेंद्र अवस्थी जी का वह चिंतन मैं कई बार पढ़ता हूं और मुझे उसे पढ़ने में इतना मजा आता है कि कुछ लिखने का मन करने लगता है।
मुद्दे की बात कविता की है। कविता में पीड़ाओं को व्यक्त करना बुरी बात नहीं है पर आपके पास उनकी कोई दवा नहीं होती ऐसे में आप अपनी कविताओं के पाठकों में आत्मविश्वास स्थापित करें जिससे कि वह उन पीड़ाओं को सहजता से अनुभव कर सकें। आप इस बात को अनुभव करें कि सुख और दुख की अनुभूति तो मन से है ऐसे में पाठक के लिये अपने कविताओं में ऐसे शब्द जरूर रखें जिससे उसमें आत्मविश्वास पैदा हो। नित-प्रतिदिन मैं अंतर्जाल पर कई ऐसे कवियों के नाम मैं पढ़ता हूं जिनके बारे में कहीं पढ़ा नहीं। संभवतः इसका कारण यह है कि हिंदी भले ही पूरे देश की भाषा है पर इसका एक प्रादेशिक स्वरूप भी है। कई कवि अपने प्रदेशों में बहुत जाने जाते हैं क्योंकि उनके नाम वहां के अखबारों में छपते रहते हैं पर दूसरे प्रदेश में उनको कोई जानता तक नहीं। यह अलग बात है कि अंतर्जाल इस सीमा को समाप्त कर देगा। ऐसे में जो कवि और लेखक अपनी मौलिकता के साथ यहां लिखेंगे उनको देश ही नहीं विदेश में भी लोकप्रियता मिलेगी। शर्त यही है कि उनकी रचनाएं बहिर्मुखी होना चाहिए। कवियों के अपने रचनाओं को लिखते समय इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए कि उस पर उनको प्रतिक्रिया त्वरित मिलेगी कि नहीं। डूब कर लिखें और पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हुए पाठकों का आत्मविश्वास बढ़ायें।
अगर मैं पाठको की प्रतिक्रियाओं को देखूं तो उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि या तो हंसाओ या ऐसा संदेश दो जिससे आत्म्विश्वास बढ़े या कोई ऐसा चिंतन व्यक्त करो जो सकारात्मक सोच हमारे अंदर भी उत्पन्न करे। अक्सर कुछ लोग सोचते हैं कि मैं अपने ब्लाग/पत्रिकाओं पर इतना अधिक लिखता क्यों हूं? इसका जवाब है पाठकों के लिये यह पत्रिका है और मेरे लिये डायरी। वैसे कल अगर अवसर मिला तो मैं राजेंद्र अवस्थी का वह लेख इसी ब्लाग पर लिखूंगा क्योंकि वह मुझे भुलाये नहींं भूलता। आज मैं गंभीर मूड में था और एक चिंतन मेरे दिमाग में चल रहा था पर जब मैंने अपने उस रजिस्टर को खोलकर देखा तो उसमें वह दिखाई दिया तब मैंने सोचा कि इतना इतना अच्छा चिंतन मैं नहीं लिख सकता क्यों न इसे टाईप कर अपने ब्लाग@पत्रिका पर चढ़ा दिया जाये।
अपने ब्लाग/पत्रिकाओं पर अधिक लिखने का जहां तक प्रश्न है। जब मुझे लोकप्रियता मिल जायेगी तो अपना एक ही ब्लाग पर लिखूंगा पर अभी वह दूर है। सबसे बड़ी बात यह है कि हास्य कवितायें लिखने को मन अब नहीं करता क्योंकि वह हिंदी के यूनिकोड में अपने पाठ काम चलाने के लिए लिख रहा था। अब देव और कृतिदेव का यूनिकोड आ जाने से जब भी हास्य कविता लिखने का विचार करता हूं तब गद्य की तरफ ही मन चला जाता है। यह आश्चर्य की बात है जिन हास्य कविताओं से लोकप्रियता मिली वह मेरा कृत्रिम रूप है। यह भी एक वास्तविकता है कि तब मैं यह मानकर चल रहा था कि इस तरह अधिक मेहनत होगी नहीं। जब तक हो रही है ठीक है। फिर अपनी शूरूआत में ही मैं पढ़ चुका था कि अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखते रहो इसी कारण भी रचनाकर्म अनवरत चलता रहा। अब मुझे कोई जल्दी भी नहीं है कृतिदेव में मैं यहां लंबी पारी खेलूंगा। हां याद आया जब मुझे सात वर्ष उच्च रक्तचाप हुआ था तब एक संपर्क में आने वाली युवा महिला ने मुझसे सहानुभूति जताते हुए पूछा था-‘इतनी छोटी आयु में आपको उच्च रक्तचाप हो कैसे गया?’
तब मैंने उससे कहा था-‘उच्च रक्तचाप मेरे व्यसनों का परिणाम हैं। एक बार मैं थोड़ा संभल जाऊं तो लंबी पारी खेलूंगा।’
एक माह पहले फिर उससे मुलाकात हुई तब उसने उत्सुकता से पूछा-कैसी चल रही है यह दूसरी पारी? आपके चेहरे पर देखकर तो सब ठीक लग रहा है।’
मैं केवल मुस्करा दिया।
कल इस ब्लाग/पत्रिका के बीस हजार पाठक संख्या पार करने पर मैं कुछ कह नहीं पाया आज कह रहा हूं। लिखो! बेपरवाह होकर लिखो! आम पाठक के लिये लिखो! लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिये लिखोगे तो तुम में भी आत्मविश्वास आयेगा। मेरे निजी मित्र न केवल मेरे पाठों को पढ़ते हैं बल्कि मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर लिंक अन्य ब्लाग के विषयों पर चर्चा करते हैं और उनकी पसंद के आधार पर ही मैं लिखने का प्रयास करता हूं। हालांकि मै हमेशा उनकी पसंद का ध्यान नहीं रखता। वह मेरे इस संपादकीय को पसंद नहीं करेंगे पर कभी कभी अपने मन की बात लिखना बुरा नहीं होता। आखिर लेखक का भी मन होता है।