बड़े होने की दौड़ में-हास्य व्यंग्य कविताएँ

ओ आम इंसान!
तू क्यों
ख़ास कहलाने के लिए मरा जाता है.
खास इंसानों की जिन्दगी का सच
जाने बिना
क्यों बड़े होने की दौड़ में भगा जाता है.
तू बोलता है
सुनकर उसे तोलता है
किसी का दर्द देखकर
तेरा खून खोलता है
तेरे अन्दर हैं जज्बात
जिनपर चल रहा है दुनिया का व्यापार
इसलिए तू ठगा जाता है.
खास इंसान के लिए बुत जैसा होना चाहिए
बोलने के लिए जिसे इशारा चाहिए
सुनता लगे पर बहरा होना चाहिए
सौदागरों के ठिकानों पर सज सकें
प्रचार की मूर्ति की तरह
वही ख़ास इन्सान कहलाता है.
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प्रचार की चाहत में उन्होंने
कुछ मिनटों तक चली बैठक को
कई घंटे तक चली बताया.
फिर समाचार अख़बार में छपवाया.
खाली प्लेटें और पानी की बोतलें सजी थीं
सामने पड़ी टेबल पर
कुर्सी पर बैठे आपस में बतियाते हुए
उन्होंने फोटो खिंचवाया
भोजन था भी कि नहीं
किसी के समझ में नहीं आया.
भला कौन खाने की सोचता
जब सामने प्रचार से ख़ास आदमी
बनने का अवसर आया.

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‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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One Comment

  1. Posted April 3, 2009 at 19:58 | Permalink

    आप बहुत अच्छा लिखते हैं. अब आप जैसे व्यक्ति को अलंकार भी दूं तो क्या? आप लिखते रहिये हम पढ़ते रहेंगे.

    बार बार तारीफ न कर सकूंगा, भगवान् की भी नहीं करता. :)


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