अंधेरे से रौशनी पैदा नहीं हो सकती-व्यंग्य कविता

धरती की रौशनी बचाने के लिये
उन्होंने अपने घर और शहर में
अंधेरा कर लिया
फिर उजाले में कहीं वह लोग खो गये।
दिन की धूप में धरती खिलती रही
रात में चंद्रमा की रौशनी में भी
उसे चमक मिलती रही
इंसान के नारों से बेखबर सुरज और चंद्रमा
अपनी ऊर्जा को संजोते रहे
एक घंटे के अंधेरे से
सोच में रौशनी पैदा नहीं हो सकती
अपनी अग्नि लेकर ही जलती
सूरज की उष्मा से ही पलती
और चंद्रमा की शीतलता पर यह धरती मचलती
उसके नये खैरख्वाह पैदा हो गये।
नारों से बनी खबर चमकी आकाश में
लगाने वाले चादर तानकर सो गये।

………………..

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

One Comment

  1. Posted April 11, 2009 at 16:25 | Permalink

    वाह क्या खूब कही.

    [एक घंटे के अंधेरे से
    सोच में रौशनी पैदा नहीं हो सकती]

    [नारों से बनी खबर चमकी आकाश में
    लगाने वाले चादर तानकर सो गये।]

    तारीफ में तो इतना ही कह सकता हूँ कि….

    छोटी सी कविता भी कहे बड़ी बात
    जब लगे कलम दीपक बाबू के हाथ.


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