हारने पर इनाम-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)


आठवीं कक्षा ‘अ’ के छात्रों को उनके शिक्षक ने बताया कि उनका उसी विद्यालय की आठवीं की अन्य कक्षा ‘ब’ से एक दस ओवरीय मैच होगा और जीतने वाली टीम के सभी सदस्यों को प्लास्टिक का चीन में निर्मित एक खिलौना, पेन, और कापी के साथ एक स्टील का कप भी मिलेगा।
एक छात्र ने पूछ लिया कि ‘सर, आप हमें जीतने वाला नहीं हारने वाला इनाम बताईये। हमने सुना है कभी कभी हारने वाले को अधिक पुरस्कार मिलता है।’
शिक्षक ने समझा कि वह मजाक कर रहा है इसलिये कह दिया कि-‘कप को छोड़कर बाकी सब चौगुना मिलेगा।’
अगले दिन मैच हुआ और ‘अ’ वाले हार गये। जीतने वाली टीम को सभी के सामने बकायदा इनाम से नवाजा गया। पुरस्कार बांटे जाते समय हारने वाले छात्र भी तालियां बजा रहे थे। यह देखकर सातवीं कक्षा के एक छात्र-जो हारी टीम के सदस्यों के ठीक पीछे ही खड़ा हुआ था- को गुस्सा आ गया पर उसने प्रेम से बोलना सिखाने वाली एक गोली खाकर हारी हुई टीम के खिलाड़ी से कहा-‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती। एक तो हार गये फिर जीतने वालों को पुरस्कार मिलने पर तालियां बजा रहे हो।’
उस मासूम परास्त योद्धा ने कहना चाहा-‘जीतने वाले से चौगुना…..’’
इससे पहले ही उसके साथी खिलाड़ी ने उसे कुहनी मारते हुए कहा-‘‘चुप! अपनी असलियत सभी को मत बता। यह अंदर की बात है। ऐसे तो तुम कभी तरक्की नहीं कर पाओगे।’’
परास्त योद्धा की बात पूरी नहीं हो पायी। इनाम वितरण कार्यक्रम समाप्त हो गया। थोड़ी देर बाद परास्त टीम के छात्र अपना गुप्त इनाम लेने कक्षा शिक्षक के पास पहुंचे और बोले-‘सर, हम बड़ी ईमानदारी से हारे। किसी को हवा तक नहीं लगने दी कि हारने के लिये खेल रहे हैं। अब लाईये हमारा चौगुना इनाम!’
कक्षा शिक्षक की आंखें फटी रह गयी और वह बोले-‘पागल हो गये हो!’ हारने वाली टीम को भी भला कभी इनाम मिलता है। अगर इसी तरह खेलों में हारने वाले को भी पुरस्कार मिलने लगे तो जीतने के लिये खेलेगा कौन?’
एक छात्र ने मासूमियत से जवाब दिया-‘जिसे चौगुना इनाम नहीं मिलेगा। वह जरूर खेलेगा। हमारे बाबा क्रिकेट के पुराने और पापा नये प्रेमी हैं। उन्होंने बताया था कि एक मैच ऐसा भी हुआ था जिसमें दोनों टीमें हारना चाहती थीं क्योंकि तब हारने पर अधिक इनाम मिलना था।’
कक्षा शिक्षक ने उनको झिड़क दिया। यह सोचकर कि बच्चे इस तरह मान जायेंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। उनमें से कुछ बच्चे अगले दिन अपने पालकों को ले आये। पालकों ने आकर कक्षा शिक्षक को घेर लिया।
एक पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का तूफानी बालर है। उसकी गेंद के आगे कोई नहीं टिक सकता। कल उसने चौगुने इनाम की लालच में ढीली और धीमी गेंद डाली। अपनी भद्द पिटवायी। अब उसका इनाम दो नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं।’
दूसरे पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का क्रिकेट की गेंद को ऐसा मारता है जैसे कि वह उसको फुटबाल दिख रही हो। कल दो रन बनाकर आउट हो गया। उसके मन में चौगुना इनाम पाने का सपना था। अब तुम चाहे जैसे भी उसका इनाम भरो।’
कक्षा शिक्षक की हवाईयां उड़ रही थी। मामला प्रिंसिपल तक जा पहुंचा। वह भी घबड़ा गये। एक बार तो उनके मन में आया कि चौगुना इनाम देकर अपने विद्यालय की लाज बचायें पर दूसरे शिक्षक ने उनको बताया कि उससे तो वह और बर्बाद हो जायेगी।
तब एक बूढ़ा चपरासी उनकी मदद को आगे आया। उसने हारने वाले छात्रों से जिरह की।
चपरासी ने पूछा-‘क्या तुमने कक्षा ‘ब’ के छात्रों से पहले इस बारे में चर्चा की थी ताकि वह भी हारने का प्रयास करें?’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने कहा-‘क्या तुममें से कोई अनफिट था जो मैदान में उतर गया हो।’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने फिर पूछा-‘तुममें से किसी ने लंगड़ाते हुए गेंद डाली। क्या कोई रनआउट या हिट विकेट हुआ? क्या किसी ने रनआउट या कैच का अवसर मिलने पर उसे छोड़ा? जिससे लगे कि तुम हारने के लिये खेल रहे हो!
छात्रों ने एक स्वर से कहा-‘नहीं! हम बहुत सफाई से हारे हैं।’
चपरासी ने कहा-‘एक भी तो सबूत तुम्हारे पास नहीं है। कैसे मान लिया जाये कि तुम हारने के लिये खेले? बेईमानी के भी कुछ उसूल होते हैं। तुम्हारे शिक्षक ने मजाक किया तो तुमने सच मान लिया। यह भी तो सोचो कि इस विद्यालय के लिये दोनों कक्षायें एक समान हैं इसलिये यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी कक्षा को तो यह बताया जाये कि हारने पर चौगुना इनाम मिलेगा पर दूसरी टीम के छात्रों को अंधेरे में रखा जाये। इसलिये अब भूल जाओ।’
पालकों के बात समझ में आ गयी। छात्र भी कोई सबूत छोड़ने में विफल रहे थे इसलिये चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई समझी। सभी चले गये। कक्षा शिक्षक ने चैन की सांस ली और चपरासी ने कहा-‘बच गया।’
चपरासी ने कहा-‘महाशय बच कैसे गये। मेरा हिस्सा भी तो दो। हारने पर ग्यारह छात्रों को जो इनाम दिया जाना था वह क्या पूरा डकार जाओगे। मेरा कमीशन भी तो दो।’
कक्षा शिक्षक ने कहा-‘अरे यार, तुम भी बच्चों जैसे बातें करने लगे। अरे, भई यह तो प्रिंसिपल साहब जानते हैं कि ऐसा कोई इनाम नहीं दिया जाने वाला था। अगर मुझ पर विश्वास न हो तो उनसे जाकर पूछ लो।’
चपरासी ने कहा-‘अब क्या आपसे जिरह करूं! मुझे मालुम होता तो कभी उन लोगों से आपको नहीं बचाता। मैंने सोचा कि कुछ मिल जायेगा। अब सब माल आप और प्रिंसिपल साहब हड़पना चाहते हो तो अलग बात है।’

कक्षा शिक्षक अपने बाल नौचते हुए बोले-‘अरे, तुम क्या बात कर रहे हो? भला हारने पर भी किसी खेल में इनाम मिलता है?’
चपरासी कंधे उचकाते हुए बोला-‘मुझे नहीं पता? पर सुना तो है। इस दुनियां में सब चलता है साहब!’
चपरासी कुटिलता से कक्षा शिक्षक की तरफ देखता हुआ चला गया। कक्षा शिक्षक आकाश की तरफ देखते हुए बोला-‘हे, सर्वशक्तिमान! क्या ऐसा भी होता है?’

नोट यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है पर अगर किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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