कभी ख्वाब तो कभी हकीक़त-व्यंग्य शायरी


जेठ की धूप में
जलते हुए उनका इंतजार करते रहे
उनके न आने पर
जमाने भर के ताने सहे।

फिर भी उनके दीदार नहीं हुए
बरसात की पहली फुहार भी
जलती आग सी लगी
कभी ख्वाब तो कभी हकीकत
लगती हैं उनकी यादें
इंतजार इतना लंबा होगा
यह कभी सोचना न था
जज्बातों की धारा में बस बहते रहे।
……………………..

बाजार में जो बिकता
वही सच्चा है प्यार ।
तस्वीरों में हमदर्द दिखता
वही गरीबों का सच्चा है यार।
नकद नारायण
दिन रात चौगुना होता रहे
वह नंबर एक का है व्यापार ।
हकीकतों और उसूलों से
कितना भी दूर हो आदमी
कोई फर्क नहीं पड़ता
रौशनी की चकाचौंध में
आंखों से देखता हुआ
जमाना खो बैठा है सोच की धार।
…………………………

लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Post a Comment

You must be logged in to post a comment.