पतंजलि योग दर्शन-ध्यान से दिव्य दृष्टि मिलती है (dhyan se divya drishti miltee hai-patanjali yoga sootra


         जब हम भारतीय योग दर्शन की बात करते हैं तो उसे सीधा पतंजलि योग सूत्र से जोड़ दिया जाता है। जब हम देश के विभिन्न योगाचार्यों की शिक्षा को देखते हैं तो उसका जो स्वरूप पतंजलि योग सूत्र  से मेल नहीं खाता।  पतंजलि योग में आसनों का अधिक रूप प्रतिपादित नहीं किया गया है। ऐसा लगता है की उनका आशय केवल सुखासन से ही हो सकता है या  पद्मासन को उसका विकल्प माना जाता है।  कहा जाता है कि पद्मासन में बैठकर प्राणायाम और ध्यान किया जाए तो फिर आसनों की आवश्यकता नहीं है। यह केवल पतंजलि योग साहित्य का एक भाग है।  दरअसल योग का विस्तार तो आसन और प्राणायाम के बाद होता है। ध्यान ही वह द्वार है जहां से उसमें प्रवेश किया जाता है।
        भारतीय योग विज्ञान का अध्ययन किया जाये तो उसके व्यापक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इसमें वर्णित क्रियाओं का अभ्यास करने सें देह के स्वस्थ होने के साथ ही जहां मन में स्फृटित विचारों की धारा का प्रवाह तो होता ही है वहीं तमाम ऐसे विषयों और व्यक्तियों के बारे में ज्ञान होता है जो हमारे निकट नहीं होते। उनके दर्शन करते हुए उनके आचार विचार का अध्ययन ध्यान के माध्यम से भी किया जा सकता है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने अंदर आयी स्फृटित धाराणाओं को सही अध्ययन नहीं कर पाते क्योंकि उनको योग विज्ञान के संपूर्ण सूत्रों का ज्ञान नहीं हो पाता।
              पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
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          नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्।
         ‘‘नाभिचक्र में संयम या ध्यान करने शरीर के व्यूह यानि पूर्ण संरचना का ज्ञान हो जाता है।’’
          कण्ठकूपे क्षत्पिपासानिवृत्तिः।।
        ‘‘कण्ठकूप में संयम या ध्यान करने से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है।’’
         कूर्मनाडयां स्थैर्यम्।।
        ‘‘कूर्माकार जिसे नाड़ी भी कहा जाता है में संयम या ध्यान करने से स्थिरता होती है।’’
        मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्।।
        ‘‘मूर्धा की ज्योति में संयम या ध्यान करने से सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते है।’’
          योग विज्ञान के ज्ञाता लोगों को तत्वज्ञान के लिये श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिए। उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने योग के प्रभावों का विशद वर्णन किया है। ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और इंद्रियां ही इंद्रियों में बरतती है’ यह तो ऐसे सूत्र हैं जिनका योग विज्ञानियों को का अवश्य अध्ययन करना चाहिए। जहां योग विज्ञान में यह बात बताई गयी है कि किस तरह अपनी इंद्रियों पर ध्यान रखकर उनको संयमित किया जा सकता है वहीं श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि स्थिरप्रज्ञ मनुष्य ही जीवन का सबसे अधिक आनंद उठाता है। सामान्य लोग अपने चंचल मन के साथ इधर उधर भटकते हैं वहीं योग विज्ञानी एक ही जगह स्थिर रहकर संसार को अपनी अंतदृष्टि से देख लेते हैं।

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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior

Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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टिप्पणियाँ

  • Pradip namdeo chogale  On नवम्बर 14, 2011 at 23:36

    I like your thought and explination.

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