Author Archives: दीपक भारतदीप

मेरा परिचय
दीपक भारतदीप, ग्वालियर

चेहरा बदल जाता है, चाल नहीं-व्यंग्य कविता (Face turns, not tricks – satirical hindi poem)

इंसान के चेहरे बदल जाते हैं
नहीं बदलती चाल।
खून खराबा करने वाले
हाथ बदल जाते हैं
वही रहती तलवार और ढाल।
इंसान से ही उगे इंसान
संभालते उसका खानदान
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,
दौलत से ही किस्मत का साथ जुड़ता है,
बड़े आदमी करते दिखावा
जमाने का भला करने का
मगर [...]

ज़िंदगी और परदे का सच-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (zindagi aur parde ka sach-hindi vyangya kavitaen)

 इस देश का आदमी

उड़ना चाहता है ऊंची उड़ान

अपने पांवों में पुरानी ज़जीरों को बांधकर.

अपनी आँखों से परदे पर

देखकर आकाश का सुनहरा दृश्य

बहलता है  सपनों के साथ

फड़कते  हैं  उसके  हाथ

नकली नायकों की कामयाबी

देखकर ही  चल पड़ता है

अंधेरी राहों पर

उसे पाने का ठानकर..

——————————-

 

परदे पर जो तुम देख रहे हो

उसे मत समझना

झूठ को सच  की [...]

पैसे से गाडी खरीदी है रास्ता नहीं-व्यंग्य चिंतन

अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक नायिका से कम नहीं समझा करते। फिल्मों में अनेक गीत नायक नायिका को रास्ते पर कार या मोटर साइकिलें चलाते हुए फिल्माये जाते हैं। वह लड़के लड़कियों के दिमाग में इस तरह अंकित रहते [...]

वादा और इंतजार-व्यंग्य कविता (vada aur intzar-hindi vyangya kavita)

गिला शिकवा खूब किया
दिन भर पूरे जमाने का
फिर भी दिल साफ हुआ नहीं।
इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये
फिर भी चैन न मिला
दिल के गुब्बारों का बोझ कम हुआ नहीं।
इंसान समझता है
पर कुदरत का खेल कोई जुआ नहीं।
—————–
उन्होंने चमन सजाने का वादा किया
नये फूलों से सजाने का
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
अभी तो उजाड़ कर
बना दिया [...]

युद्ध और सत्संग-व्यंग्य कविता

धर्म के लिए अब नहीं होता सत्संग
हर कोई लड़ रहा है, उसके नाम पर जंग.
किताबों के शब्द का सच
अब तलवार से बयान किया जाता
तय किये जाते हैं अब धार्मिक रंग.
एक ढूँढता दूसरे के किताब के दोष
ताकि बढ़ा सके वह ज़माने का रोष
दूसरा दिखाता पहले की किताब में
अतार्किक शब्दों का भंडार
जमाने के लिए [...]

धर्मजोद्धा और कर्मजोगी-व्यंग्य कविता (dharm aur jog-vyangya kavita)

वह धर्मजुद्ध से करने निकले
जमाने भर की सफाई।
अमन का नारा लगाते किया शोर
शीतलता के लिये चहुं ओर आग लगाई।।
तलवार से लड़ते धर्मजुद्ध तो
धरा पर सिर कटकर गिरते हैं,
शब्द घौंपते है खंजर की तरह तो
भले इंसानों के दिल भी हिलते हैं,
एक पल भी मोहब्बत का नहीं जुटाते
कर लेते हैं धर्मजोद्धा नाम की कमाई।।
कहें दीपक बापू
इतिहास [...]

रौशनी करने का सदियों पुराना अभियान-व्यंग्य कविता (raushni ka abhiyan-vyangya kavita)

दीपावली पर घर में
आले में बने मंदिर से लेकर
गली के नुक्कड़ तक
प्रकाश पुंज सभी ने जला दिये।
अंतर्मन में छाया अंधेरा
सभी को डराता है
लोग बाहर ढूंढते हैं, रौशनी इसलिये।
ज्ञान दूर कर सकता है
अंदर छाये उस अंधेरे को
पर उसके लिये जानना जरूरी है
अपने साथ कड़वे सत्य को
जिससे दूर होकर लोग
हमेशा भाग लिये।
कौन कहता है [...]

चाणक्य नीति-पवित्र काम मन लगाकर पूरा करें (pavitra kaam-chankya niti in hindi)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
————————-
धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।।
हिंदी में भावार्थ- धन से रहित व्यक्ति को
दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन और अन्य वस्तुयें हैं पर अगर उसके पास विद्या नहीं है तो वह वास्तव में दीन हीन [...]

ख्वाब जब हकीकत बनते हैं-हिन्दी शायरी (khavab aur haqiqut-hindi shayri)

सपने जैसे शहर में
ख्वाब लगती उस इमारत की छत के नीचे
रौशनी की चमक से आंखें चुंधिया गयी हैं
फिर याद आती है
पीछे छोड़ आये उस शहर और घर की
जहां अंधेरे भी अक्सर आ जाते हैं।
राहें ऊबड़ खाबड़ है
गिरने का डर साथ लिये हर पल चलते जाते हैं
सपना जो सच बन कर सामने खड़ा है
फिर एक ख्वाब [...]

कड़वा सच बोलकर क्यों संताप सहो-हिंदी कविता

कहो कुछ भी
करो कुछ और।
बन जाओगे जमाने के सिरमौर।
सभी को सुनने में अच्छा लगे
ऐसे शब्द अपने मुख से कहो
कड़वा सच बोलकर क्यों संताप सहो
भीड़ में वाह वाह जुटा लो
शौहरत जिससे मिले
ऐसी अदाकारी लुटा दो
बाद में क्या करते हो
इस पर कौन करता है गौर।
…………………………….
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से [...]

हमदर्दी बेजान होकर जताते-हिन्दी व्यंग्य कविता (bezan hamdardi-hindi satire poem)

अक्सर सोचते हैं कि
कहीं कोई अपना मिल जाए
अपने से हमदर्दी दिखाए
मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ
पर इंसान और शय में फर्क नहीं कर पाते.
हम अपने दर्द छिपाते
लोग उनको ही ढूंढ कर
ज़माने को दिखाने में जुट जाते
कोई व्यापार करता
कोई भीख की तरह दान में देता
दिल में नहीं होती पर
पर जुबान और आखों से [...]

अपनों से अजनबी हो जाओ-हिंदी शायरी (hindi poem)

हमने छोड़ दिया यकीन करना
धोखे की बचने को यही रास्ता मिला
उधार तो अब भी देते हैं
वापसी पर नहीं होता किसी से गिला.
———————-
दोस्ती में धोखे होते हैं
फिर क्यों रोते हैं.
अपनी हकीकत अपने से न छिपा सके
दोस्त को बाँट दी
हो गए बदनाम तो फिर क्यों रोते हैं.
————————–
गैरों में अपनापन क्यों तलाशते हो
अपनों से अजनबी होकर.
वो गैर [...]

तीक्ष्ण बुद्धि-हास्य कविता (sharp mind-hasya kavita)

आज के बच्चे
अपने माता पिता के बाल्यकाल से
अधिक तीक्ष्ण बुद्धि के पाये जाते
यह सच कहा जाता है।
किस नायिका का किससे
चल रहा है प्रेम प्रसंग
अपने जन्मदिन पर नायक की
किस दूसरे नायक से हुई जंग
कौन गायक
किस होटल में मंदिर गया
कौन गीतकार आया नया
कौनसा फिल्मी परिवार
किस मंदिर में करने गया पूजा
कहां जायेगा दूजा
रेडियो और टीवी पर
इतनी बार सुनाया [...]

किसी को रात डराती,किसी को दिन-हिन्दी शायरी (din aur raat-hindi shayri)

हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डूबता हुआ
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में
जश्न मनाने की तैयारी
पर हमने देखा था पूरा दिन
हमारा मन भी था डूबा हुआ
वह आसमान में टिमटिमाते तारों की
बात करते हुए खुश हो रहे थे
जबकि हमारा बदन था
तब भी पसीने की बदबू लिया हुआ
सबकी जमीन और आसमान
अलग-अलग होते हैं
किसी को रात [...]

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-किसी को अपनी योग्यता से अधिक महापद भी मिल जाता है (ablity and post-kautilya ka arthshastra)

कौटिल्य महाराज के अनुसार
—————————-
उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।
हिंदी में भावार्थ-जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।
प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।
हिंदी में भावार्थ-प्रमाणित योग्यता से अधिक [...]

भीड़ में गुलाम-व्यंग्य कविता (soch ke gulam-vyangya kavita)

हम यूं तन्हा नही रह जाते
अगर उस भीड़ में शामिल होते।
सभी चले जा रहे थे
उम्मीदों के गीत गा रहे थे
हमने वजह पूछी
पर किसी ने नहीं बताई
ऐसा लगा किसी के खुद ही समझ नहीं पाई
हम भी बढ़ाते उनके साथ कदम
अगर दूसरे की सोच के गुलाम होते।
…………………..
यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की [...]

क्रिकेट और फिल्म में सफलता का साया-हास्य कविता(cricket and film-hasya kavita

नायिका ने बहुत किया अभिनय
पर चलचित्रों में सफलता का
दौर नहीं चल पाया।
नंबर वन की दौड़ में न पहुंचने पर
उसने प्रेमी निदेशक से अफसोस जताया।
तब वह बोला-
‘‘लगता है कि अपना नाम
फिल्म बाजार में ऐसे नहीं चलेगा,
केवल किसी अभिनेता के साथ
तुम्हारे नकली इश्क से मामला नहीं बनेगा,
मेरे अंदर एक नया विचार चल रहा है,
चलचित्र जगत [...]

बासी खबर में उबाल-हिंदी व्यंग्य कविता (basi khabar men ubal-hindi vyangya kavita)

अखबार में छपी हर खबर
पुरानी नहीं हो जाती है।
कहीं धर्म तो कहीं भाषा और जाति के
झगड़ों में फंसे
इंसानी जज़्बातों की चाशनी में
उसके मरे हुए शब्दों को भी
डुबोकर फिर सजाया जाता
खबर फिर ताजी हो जाती है।
………………………..
कौन कहता है कि
बासी कड़ी में उबाल नहीं आता।
देख लो
ढेर सारी खबरों को
जो हो जाती हैं बासी
आदमी जिंदा हो या स्वर्गवासी
उसके [...]

हिंदी दिवस:व्यंग्य कवितायें व आलेख (Hindi divas-vyangya kavitaen aur lekh)

लो आ गया हिन्दी दिवस
नारे लगाने वाले जुट गये हैं।
हिंदी गरीबों की भाषा है
यह सच लगता है क्योंकि
वह भी जैसे लुटता है
अंग्रेजी वालों के हाथ वैसे ही
हिंदी के काफिले भी लुट गये हैं।
पर्दे पर नाचती है हिंदी
पर पीछे अंगे्रजी की गुलाम हो जाती है
पैसे के लिये बोलते हैं जो लोग हिंदी
जेब भरते ही उनकी [...]

रिश्ता और सवाल जवाब-हास्य कविता (rishta aur sawal jawab-hasya kavita

रिश्ता तय करने पहुंचे लड़के ने
लड़की से पूछा
‘‘क्या तुम्हें खाना पकाना
सिलाई कढ़ाई, बुनाई तथा
घर गृहस्थी का काम करना आता है।’’
पहले शर्माते
फिर लड़के से आंख मिलाते हुए
लड़की बोली
‘हां, सब आता है।
पर आप यह भी बताईये
क्या आपको घर गृहस्थी चलाने लायक
कमाना भी आता है।
मैं खाना पकाने के लिये
परंपरागत सामान नहीं उपयोग करती
चाहिये उसके लिए इलेक्ट्रोनिक सामान,
कढ़ाई के [...]