पहले अपने को ही पहचान ले मेरे मन!


किसके मन में क्या है कौन जानेगा

अपने मन को ही भला कौन जानता है

पल-पल हालात के साथ बदलता मन

कौन लगाम कस सकता है इस पर

जो करते हैं इसे काबू

वह संत बन जाते हैं

पर सब संतों का भी मन

काबू में नहीं होता

जगह-जगह आश्रमों के लिए

जमीन की चाहत में सत्ता के

गलियारों में भटकता है उनका मन

यह मन ही है जो चलाता है

हम सोचते हैं कि हम चल रहे हैं
जब जान जाओगे इसकी चाल को

मन चलेगा वैसे ही जैसे तुम चाहते हो

वरना खुद भी भटकेगा

तुम्हें भी भटकायेगा यह मन

——————–

ए मेरे मन तू उदास क्यों है

इस तन्हाई से परेशान क्यों है

तेरी चाहत होती है भीड़ में

दोस्त तलाशने की

पर कोई ऐसा मेला नहीं लगता

जहां वफ़ा मिलती हो

यहां कोइ ऎसी बाज़ार नहीं है

जहां सच्चा प्यार मिलता हो

आहिस्ता-आहिस्ता चलता चल

कारवां चलता रहेगा

लोग मिलते और बिछड़ते रहेंगे

अपने ही अन्दर ढूँढ

प्यार और वफ़ा

फिर कोशिश कर

कहीं बाहर तलाशने की

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टिप्पणियाँ

  • Ramesh  On अप्रैल 21, 2007 at 05:11

    बहुत खूब। कहते है ना मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन से आकाश की ऊंचाईयाँ भी छूई जा सकती है और मन से पाताल की गहराईयाँ भी नापी जा सकती है। मन ही अपना मित्र और मन ही अपना शत्रु – जब मन के कारण ही मन अपना शत्रु बनाया जा सकता है तो फिर मन के कारण ही उसको मित्र बनाने की कला भी मन से सीखी जा सकती है स्वंय मन से। क्यों?

    रमेश

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