पद ऊँचा, बौना चरित्र तो यही दिखेगा चित्र


इस देश कि सबसे बड़ी समस्या क्या है? भ्रष्टाचार, बेकारी भुखमरी, पेयजल का संकट , बिजली की कमी या खाद्धान्न का अभाव । जीं नहीं यह समस्या नहीं हैं बल्कि हमारी अज्ञानता, संकीर्ण विचारों, अदूरदर्शिता और लापरवाही से उपजी उस समस्या का परिणाम है जिसने बोने चरित्र के लोगों को ऊंचे पदों पर पहुंचा दिया है और भले काम को संपन्न करने का ठेका निम्न चरित्र के लोगों को मिलने लगा है। इस देश की समस्या है सज्जनों की निष्क्रिय सज्जनता और बुद्धिजीवियों का यथास्थ्तिवादी रवैया है। सज्जन आदमी किसी भी घटना पर यह सोचकर चुप हो जाता है कि मेरे साथ कोई वारदात थोड़े ही हुयी है, और बुध्दिजीवी किसी घटना पर जो बहस करते हैं उसमें केवल सतही विचार व्यक्त करते हैं और आख़िर उनके वार्तालाप पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। अब तो यह हालत हो गयी है कि हर प्रकार के छोटे और बडे अपराध में तथाकथित बडे लोगों का हाथ निकलता है। मैं किसी घटना का जिक्र इसलिये नहीं करता क्योंकि उससे चिन्तन कि धारा संकीर्ण हो जाता है और वह एक घटना में सीमित होकर रह जाता है । मानव तस्करी, अनैतिक संबंध और अपराधियों से नजदीकी रिश्ते जैसे आरोपों से सभी तथाकथित बडे लोगों पर ही लगे हैं और आजकल लड़कियों की मोहब्बतों की कथाओं में जुटा मीडिया इन पर कभी खुलकर बहस नहीं करता । आख़िर विदेशों में बैठे अपराधी क्या केवल शासकीय कर्मचारियों और अधिकारीयों के दम पर ही सारा कारोबार चला रहे है? मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह किसी का नाम ले सके, घर से भागी लड़कियों को अपने माता-पिता के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते दिखाने में उसे मजा आ रहा है । जिनके घर की लडकियां भाग जाती हैं उनके माता-पिता की क्या हालत होती है इसका ख़्याल उसे नहीं रहता । सज्जन लोग अपनी इज्जत के भय से दुबक जाता है, और मिडिया उसे इश्क का दुश्मन और जाने कौनसे शब्दों से नवाज्ता है। क्रिकेट में भारत की हार की समीक्षा करते समय कयी ऐसे पहलू मीडिया ने छुए तक नहीं जिनपर जनता को संदेह था। मैं उसे भी दोष नहीं देता क्योंकि उसमें भी वही लोग काम जिन्होंने मैकाले द्वारा रचित शिक्षा प्रणाली से अपना जीवन शुरू किया है और क़सम खा रखी है कि क्लर्क की तरह ही काम करेंगे । आजादी के बाद नारों की जो नयी संस्क्र्ती इस देश में बनना शुरू हुई तो उसने धीरे धीरे गंभीर चिंतन की प्रवृति को समाप्त ही कर दिया। जो लोग शिक्षित हुए उन्हें क्लर्क बनने की पंक्ति में लगा दिया और जो महत्वाकांक्षी थे उनके लिए बडे प्रशासकीय पदों का सृजन कर उन्हें सुशोभित किया गया। तब तक इस देश में परिवार वाद का भाव नहीं पनपा था और इसीलिये बडे लोगों ने अपना बड़प्पन बनाए रखने के लिए जनता के भलाई के लिया कम किया पर मैकाले ने जो सपना इस देश में जो क्लर्क पैदा करने का सपना देखा था उसे इस देश के शिक्षाविदों ने जारी रखा। जब बौध्दिक निष्क्रियता की प्रवृति स्थापित हो गयी तो शुरू हो गया परिवारवाद और भायी-भतीजावाद का दौर – और फिर उनकी रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किये जाने लगे। बोने चरित्र के लोगों ने इसका लाभ उठाया और अब जो चित्र हमारे सामने है वह यह है कि भला आदमी सब तरफ से आतंक के साए में जीं रहा है और बोने चरित्र और विचार वाले लोग ऊंचे पदों पर पहुंच गये इसका एक ही उपाय है सज्जन अपनी सज्जनता को भय के साथ नहीं वरन हिम्मत के साथ जिए और बोने चरित्र वाले लोगों का सम्मान करना बंदकर दे ।

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