अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे भी नहीं रहेंगे


                       एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत की तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था और आईटी सेक्टर में शानदार तरक्क़ी के कारण हाल के वर्षों में लगभग ६० हजार आईटी विशेषज्ञ भारत लॉट आए हैं । यह वापसी अमेरिका की प्रसिध्द सिलिकान वेली से हो रही है जहां जाना किसी समय भारत के हर आईटी छात्र का एक सपना होता था। २००३ में यह वापसी १५ से २० हजार आंकी गयी थी। बताया गया है आईटी कंपनियाँ कम वेतन और बेहतर गुणवता के भारत की और आकर्षित हो रही हैं ।

           अगर हम इस रिपोर्ट पर विचार करे तो एक लंबे समय तक भारत से प्रतिभा पलायन को रोना रोया जाता रहा था, और अब कुछ समय बाद यही बात अमिरिका में दोहराई जाने वाली है।यह सही है अमेरिका अभी भी कई लोगों के लिए एक सपना है, पर उसका वर्तमान स्वरूप उसके अपने मूल लोगों के कारण नहीं वरन बाहर से लाए गये पैसे और लोगों की वजह से है। उसकी वैज्ञानिक संस्था नासा में बडी संख्या में भारतीय काम करते हैं-और उनके काम से नासा ने बहुत विकास किया है । व्यापार के मामले अमेरिका की कोई छबि नहीं है और दक्षिण कोरिया और जापान इस मामले में उससे कहीं आगे हैं । भारतीयों ने जो अमेरिका में विकास किया है उससे वहां के स्थानीय निवास कोई बहुत ज्यादा प्रसन्न नहीं हैं और उनका गुस्सा कई बार उन पर निकलता भी है। शीत युद्ध का सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका को ही मिला और उसने कई देशों में अपने गुप्तचर संस्था के माध्यम से अशांति फैलाकर हथियार बेचने के व्यापार से अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ की। अन्तरिक्ष क्षेत्र में कभी उसके साथ सोविअत संघ का बोलबाला था पर उसके विघटन के बाद अमेरिका इस क्षेत्र में अकेला रह गया, और उसने पूरे विश्व में एकछत्र प्रभाव कायम कर दिया-सोविअत संघ के विघटन से जो देश उसपर हथियारों के मामले में निर्भर थे वह भी अमेरिका की तरफ झुकने के लिए बाध्य हुए और भारत उनमें एक था। अब हालत बदल चुके है और चीन और भारत अन्तरिक्ष के मामले में उसे चुनौती देने की स्थिति में आ गये हैं , अभी हथियारों के मामले में वह आगे है पर इससे भी कोई देश खौफ नही खाता क्योंकि अमेरिका के पास सामरिक रुप से मजबूत बने रहने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है उसके शत्रु अब राष्ट्र नही वरन आतंकवादी संगठन हैं जिन्हें ढूँढना आसान काम नहीं है और वह नित-प्रतिदिन उस पर हमले के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं।

             अमेरिका में जब भारतीयों के जाने का रुझान चरम पर था तब उनका एक ही उद्देश्य था पैसा कमाना । अमेरिका और भारतीयों की समाजिक स्वरूप में भी अंतर है और भारतीयों को वहां के समाज में मिलने में अक्सर कठिनाए होती थी। अब जब वहां भारतीय अधिक संख्या में पहुंचे तब वह अपना एक समाज बना पाए और इसी बीच भारत भी एक आर्थिक महाशक्ति बन गया और अपने ब्रह्द समाज से पुन: जुड़ने की चाहत में वह उस स्वप्न देश को छोड़ने के लिए तैयार हुए हैं जहां उनके और उनकी पीढ़ियों के भविष्य की कोई गारंटी नहीं है। यहां उन्हें अमेरिका से कम वेतन मिलेगा पर अपने समाज में मिलकर रहने से कई ऐसे लाभ भी मिलते हैं जो पैसा खर्च कराने पर नहीं मिलता । इसमें खुश होने जैसा भी कुछ नहीं है क्योंकि इस सृष्टि का कुछ नियम है और माया के भी। सृष्टि इन परिवर्तनों की प्रेरक और नियंता होती है और माया जिसके बारेमें कहा जाता है कि वह किसी एक की होकर नहीं रहती।कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था तो इसे लूटने के लिए लोग विदेशों से सेना लेकर आये और धीरे धीरे यह देश गरीबों का देश होता गया। यहां दूध की नदियां बहती थी और आज हालात यह है ४० प्रतिशत से ज्यादा जनसँख्या गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है। हम मानकर चलते हैं कि अगर वह अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेगे । इस देश की जो प्रतिभा विदेशों में जाकर उस देश को शिखर पर बैठा सकती है तो अपने देशको भी सम्मान दिलवा सकती है।

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