खिलाडियों को माडलों जैसी छूट भेदभावपूर्ण


                  सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर और भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड को आयकर में गलत ढंग से छूट पर सीएजी ने अपनी आपत्ति जताई है । यह जानकारी संसद में पेश की गयी रिपोर्ट में कही गयी है । यहां मैं साफ कर दूं कि इसके लिए उस व्यक्ति को दायी नहीं ठहराया गया जिसने छूट ली बल्कि उस विभाग को ही जिम्मेदार ठहराया गया है जिसने छूट दीं। यह खबर मैंने टीवी चैनलों पर ही सुनी है और जिस तरह वह इसे प्रस्तुत कर रहे हैं उससे उनके ज्ञान पर थोडा अचरज है। एक तरह से वह मूल विषय से हट रहे हैं। यहाँ छूट लेने पर नही देने के मुद्दे पर विचार होना चाहिए।

             सीएजी को संविधान में सरकारी लेखाओं के परीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है और यह उसका कर्तव्य भी है। उसके संगठन में अधिकारियों और कर्मचारियों को न केवल कानून का ज्ञान होता है वरन उन्हें लेखा कार्य में दक्षता भी प्राप्त होती है और उनके द्वारा उठाई गयी आपत्तियों की कोई काट हो ही नही सकती-हालांकि कानून के बारे में अन्तिम निर्णय अदालत का होता है पर सीएजी की रिपोर्ट कई स्तरों पर जांच की बाद तैयार की जाती है और इसी कारण उसकी विश्वसनीयता भी रहती है । विज्ञापन से प्राप्त आय से कभी भी आयकर में छूट नहीं मिलती, जो आयकर भरते हैं उन्हें यह बात अच्छी तरह मालुम है। खेल से प्राप्त फ़ीस और इनाम पर आयकर नहीं लगता, यह भी नियम है, यानी किसी क्रिकेट खिलाड़ी को किसी प्रतियोगिता के जीतने पर मिलने वाला इनाम और फ़ीस पर कोई आयकर नहीं देना होता। अब क्रिकेट खिलाड़ियों को मिलने वाली रकम लाखों में है तो भी उन्हें कोई आयकर नहीं देना होता। इस पर आपत्ति नहीं है और होना भी नहीं चाहिऐ, पर विज्ञापन से मिलने वाली आय भले ही वह क्रिकेट खेलने के कारण मिलते हैं उन्हें किसी तरह भी आयकर के दायरे से बाहर नही माना जा सकता । जिस तरह उन्हें छूट दीं गयी है और सीएजी ने आपत्ति की है उससे आयकर विभाग के रवैये पर संदेह होता है ।

            देश में जो शासकीय और अशासकीय कर्मचारी है वह अपने लिए छूट पाने के लिए कितने जतन करते हैं यह वही जानते हैं। और जिस तरह खेलों की आड़ में इन क्रिकेट खिलाडियों को छूट दीं गयी है उससे यह प्रश्न पैदा होता ही इसके पीछे आयकर विभाग का उद्देश्य क्या है ? सरकार ने खेलों के विकास के मद्देनज़र उससे मिलने वाली राशी को आयकर से मुक्त किया था और विज्ञापन से प्राप्त आय किसी भी रुप में खेल का विकास नहीं करती-आयकर कानून के हिसाब से वह करमुक्त भी नहीं है यह तथ्य इस विषय का सामान्य जानकार भी बता देगा फिर उसके विभाग के अधिकारी उस नियम से कैसे अनभिज्ञ हो सकते हैं?

         सचिन के साथ किसी विभाग द्वारा रियायत बरतने का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी तथाकथित रुप से विदेश में उपहार में दीं गयी कार में कस्टम विभाग द्वारा दीं गयी छूट का मामला भी उठ चुका है । सचिन और गावस्कर को इस मामले में किसी भी प्रकार का दोष देना गलत होगा क्योंकि उन्होने अपनी आय बताते हुए छूट मांगी थी और अगर इस मामले में किसी नैतिकता या देशभक्ति का प्रश्न उठाएंगे तो मूल विषय से भटक जायेंगे क्योंकि कानून के दायरे में रहकर ऎसी कोशिश सभी करते हैं और यह जिम्मा तो कानून लागू करने वाले विभाग का है कि वह अपने नियमों के अनुसार वह निर्णय ले। सीएजी ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी है उस पर कार्यवाही करना सरकार का काम है और देखना है कि वह क्या करती है। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते मैं जानता हूँ कि भारत में धन के असमान वितरण की समस्या है पर कानून की दृष्टि से कोई असमान नहीं होना चाहिए। एक तरफ सचिन से तीन करोड़ से ज्यादा रकम नहीं ली गयी जबकी वेतनभोगी कर्मचारी कुछ सौ रूपये का आयकर बचाने के लिए हाथ पाँव मारता है। इससे देश में कोई अच्छा संदेश नहीं जा रहा है।

 एक तरफ सरकार आम नागरिक से ईमानदारी से कर अदा करने के लिए अपील करती है दूसरी तरफ खास लोगों को कानून के पेंचों का लाभ उठाने में मदद के लिए उसके विभाग से मदद करते हैं । इस विषय को केवल सचिन और गावस्कर तक ही सीमित न रखते हुए हुए सरकार को अन्य लोगों की दीं दीं गयी रियायत पर भी अपना ध्यान देना चाहिए । इस मामले में भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड पर जरूर आश्चर्य हो रहा है क्योंकि वह किसी की निजी संस्था नहीं है और देश के नाम का उपयोग करते हुए ही वह दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बना, क्या होता अगर उसका कुछ पैसा सरकार के खजाने में चला जाता ?किसी व्यक्ति के जेब से पैसा थोड़े ही जा रहा था, और फिर सरकार के संरक्षण में ही उसके मैच हो पाते हैं हजारों पुलिस के जवान उसके मैच संपन्न करवाने के लिए अपना ख़ून पसीना एक करते हैं और उनका वेतन सरकारी खजाने से ही मिलता है।

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